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Mufti-e-Azam Bari Sarkar Hai

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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मुफ़्तिए आज़म बड़ी सरकार है जबकि अदना सा गदा अत्तार है मुफ़्तिए आज़म से हम को प्यार है इंशा अल्लाह अपना बेड़ा पार है मुफ़्तिए आज़म रज़ा का लाड़ला और मुहिब्बे सय्यिदे अबरार है आलिमो मुफ़्ती फ़क़ीहे बे-बदल ख़ूब ख़ुश अख़्लाक़ो बा-किरदार है ताजदारे अहले सुन्नते अलमदो बंदा दरे बे-कसो नाचार है तख्ते शाही क्या करूँ मेरे लिए ताजे इज़्ज़त आप की पज़ार है आला हज़रत का रहूँ मैं बा-वफ़ा इस्तिक़ामत की दुआ दरकार है आस्ताने पर खड़ा है इक गदा तालिबे इश्क़े शहे अबरार है मुस्कुरा कर इक नज़र गर देख लो मेरी शामे ग़म अभी गुलज़ार है मेरे दिल को शाद फ़र्मा दीजिये रंजो ग़म की क़ल्ब पर यल़ग़ार है सय्यिदी अहमद रज़ा का वास्ता तेरा माँगता तालिबे दीदार है हूँ गुनाहों के मर्ज़ से नीम जाँ दर्दे इसियाँ की दवा दरकार है हाथ फैला कर मुरादें माँग लो साइलों उन का सख़ी दरबार है इंशा अल्लाह मग़फ़िरत हो जाएगी ऐ वली! तेरी दुआ दरकार है ख़ूब ख़िदमत सुन्नतों की मैं करूँ सय्यिदी तेरी दुआ दरकार है काश नूरी के सग्गों में हो शुमार ये तमन्नाए दिले अत्तार है मुफ़्ती-ए-आज़म बड़ी सरकार है जबके अदना सा गदा अत्तार है मुफ़्ती-ए-आज़म से हम को प्यार है इन-शा-अल्लाह अपना बेड़ा पार है मुफ़्ती-ए-आज़म रज़ा का लाडला और मुहिब-ए-सय्यद-ए-अबरार है आलिम ओ मुफ़्ती, फ़कीह-ए-बे-बदल ख़ूब ख़ुश-अख़लाक़ ओ बा-किरदार है ताजदार-ए-अहल-ए-सुन्नत अल-मदद बंदा-ए-दर बे-कस ओ नाचार है तख़्त-ए-शाही क्या करूँ मेरे लिए ताज-ए-इज़्ज़त आप की पज़ार है आला हज़रत का रहूँ मैं बा-वफ़ा इस्तिकामत की दुआ दरकार है आस्ताने पर खड़ा है एक गदा तालिब-ए-इश्क़-ए-शाह-ए-अबरार है मुस्कुरा कर एक नज़र गर देख लो मेरी शाम-ए-ग़म अभी गुलज़ार है मेरे दिल को शाद फ़र्मा दीजिये रंज ओ ग़म की क़ल्ब पर यलग़ार है सय्यद-ए-अहमद रज़ा का वास्ता तेरा मंगता तालिब-ए-दीदार है हूँ गुनाहों के मरज़ से नीम जाँ दर्द-ए-इसियाँ की दवा दरकार है हाथ फैला कर मुरादें माँग लो साइलों उन का सख़ी दरबार है इन-शा-अल्लाह मग़फ़िरत हो जाएगी ऐ वली! तेरी दुआ दरकार है ख़ूब ख़िदमत सुन्नतों की मैं करूँ सय्यदी तेरी दुआ दरकार है काश! नूरी के सगो में हो शुमार ये तमन्ना-ए-दिल-ए-अत्तार है