मुझ को दरपेश है फिर मुबारक सफ़र क़ाफ़िला अब मदीने का तैयार है
नेकियों का नहीं तोशा फ़क़त मेरी झोली में अश्कों का इक हार है
कुछ न सजदों की सौगात है और न कुछ ज़ुहद-ओ-तक़वा मेरे पास सरकार है
चल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगर हाए सर पर गुनाहों का अंबार है
जुर्म-ओ-इसयां पे अपने लजावा हुआ और अश्क-ए-नदामत बहाता हुआ
तेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआ दर पे हाज़िर ये तेरा गुनाहगार है
तेरा सानी कहाँ! शाह-ए-कौन-ओ-मकां मुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ!
तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो जहाँ! क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है?
या नबी! तुझ पे लाखों दुरूद-ओ-सलाम इस पे है नाज़ मुझ को हूँ तेरा ग़ुलाम
अपनी रहमत से तू शाह-ए-ख़ैरुल अना़म मुझ से आसी का भी नाज़-बरदार है
मुजरिमों को शहा! बख़्शवाता है तू अपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तू
ग़म के मारों को सीने लगाता है तू ग़मज़दों बे-कसों का तू ग़मख़्वार है
सरवर-ए-अंबिया रहमत-ए-दूसरा तू ही मुश्किल कुशा तू ही हाजत रवा
जब भी सर पर मेरे कोई टूटी बला इज़न-ए-रब से तू मेरा मददगार है
ज़ेर-ए-जिस्म-ए-मुबारक कभी बोरिया हाथ तकिया है बिस्तर कभी ख़ाक का
जान-ओ-दिल सादगी पे हों उस की फ़िदा जो कि सारे रसूलों का सरदार है
दो तड़पने का आक़ा क़रीना मुझे दे दो ख़स्ता जिगर चाक सीना मुझे
चश्म-ए-तर दे दो शाह-ए-मदीना मुझे तेरे ग़म का ये बंदा तलबगार है
ठोकरें दर-ब-दर तक अब खाऊँ मैं फिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैं
काश! क़दमों में सरकार मर जाऊँ मैं या नबी! ये तमन्ना-ए-बदकार है
सुन्नतें मुस्तफ़ा की तू अपनाए जा दीन को ख़ूब मेहनत से फैलाए जा
ये वसीयत तू अत्तार पहुँचाए जा उस को जो उन के ग़म का तलबगार है