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Mustafa Khair-ul-Wara Ho

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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मुस्तफ़ा खैरुलवरा हो, सरवरे-हर दूसरा हो अपने अच्छों का तसद्दुक, हम बदों को भी निबाहो किस के फिर हो कर रहें हम, गर तुम्हें हम को न चाहो बद हंसे तुम उन की ख़ातिर, रात भर रू कर रहो बद करें हर दम बुराई, तुम कहो उन का भला हो हम वही नाश्तारू हैं, तुम वही बहरे-अता हो हम वही शायाने-रद हैं, तुम वही शाने-सख़ा हो हम वही बेशर्मो-बद हैं, तुम वही काने-हया हो हम वही नंगे-जफ़ा हैं, तुम वही जाने-वफ़ा हो हम वही क़ाबिले-सज़ा के, तुम वही रहीमे-ख़ुदा हो चरख़ बदले दहर बदले, तुम बदलने से वरा हो अब हमें हों सहो हाशा, ऐसी भूलों से जुदा हो उम्र भर तो याद रखा, वक़्त पर क्या भूलना हो वक़्ते-पैदाइश न भूले, कैफ़ा यंसा क्यों क़ज़ा हो यह भी मौला अर्ज़ कर दूँ, भूल अगर जाओ तो क्या हो वह हो जो तुम पर गिरां है, वह हो जो हरगिज़ न चाहो वह हो जिस का नाम लेते, दुश्मनों का दिल बुरा हो वह हो जिस के ख़ातिर, रात दिन वक़्फ़े-दुआ हो मर मिटें बर्बाद बंदे, ख़ाना आबाद आग का हो शाद हो इब्लीसे-मलऊन, ग़म किसे उस क़हर का हो तुम को हो वल्लाह तुम को, जानो-दिल तुम पर फ़िदा हो तुम को ग़म से हक़ बचाए, ग़म अदू को जाँ-गज़ा हो तुम से ग़म को क्या तअल्लुक़, बेकसों के ग़म-ज़दा हो हक़ दरूदें तुम पे भेजे, तुम मुदाम उस को सराहो वह अता दे तुम अता लो, वह वही चाहे जो चाहो बर तो आओ पाशद तो बर मा, ता अबद यह सिलसिला हो क्यों रज़ा मुश्किल से डरिए जब नबी मुश्किल कुशा हो