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Muzdah baad ae aasiyo! Shafee-e-Shah-e-Abrar hai

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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मुज़्दा बाद ऐ आसियो! शाफ़े-ए-शाह-ए-अबरार है तहणियत ऐ मुजरिमो! ज़ात-ए-ख़ुदा ग़फ़्फ़ार है अर्श सा फ़र्श-ए-ज़मीं है फ़र्श-ए-पा अर्श-ए-बरीं क्या निराली तर्ज़ की नाम-ए-ख़ुदा रफ़्तार है चाँद शक़ हो पेड़ बोलें जानवर सजदे करें बारकलल्लाह मरजअ-ए-आलम यही सरकार है जिन को सू-ए-आसमाँ फैला के जल थल भर दिये सदक़ा उन हाथों का प्यारे हम को भी दरकार है लब-ए-ज़ुलाल-ए-चश्मा कुन में गुंधे वक़्त-ए-ख़मीर मुर्दे ज़िंदा करना ऐ जाँ तुम को क्या दुश्वार है गोरे गोरे पाँव चमका दो ख़ुदा के वास्ते नूर का तड़का हो प्यारे गोर की शब-ए-तार है तेरे ही दामन पे हर आसि की पड़ती है नज़र एक जान-ए-बे-ख़ता पर दो जहाँ का बार है जोश-ए-तूफ़ाँ बहर-ए-बे-पायाँ हुआ ना साज़गार नूह के मौला करम कर ले तो बेड़ा पार है रहमतुल-लिल-आलमीन तेरी दुहाई दब गया अब तो मौला बे-तरह सर पर गुनाह का बार है हैरतें हैं आईना दार-ए-वफ़ूर-ए-वस्फ़-ए-गुल उन के बुलबुल की ख़ामोशी भी लब-ए-इज़हार है गूँज गूँज उठे हैं नग़मात-ए-रज़ा से बोस्ताँ क्यों ना हो फूल की मिदहत में वा मिनक़ार है