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Na Koi Rusookh-o-Asar Chahiye

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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न कोई रुसूख़ ओ असर चाहिए फ़क़त तेरी सीधी नज़र चाहिए ज़माने की खूबी ज़माने को दे मुझे सिर्फ़ दर्द-ए-जिगर चाहिए रहे जिस में इश्क़-ए-हबीब-ए-ख़ुदा वह दिल वह जिगर और वह सर चाहिए कोई राज़ चाहे कोई तख़्त ओ ताज मुझे तेरे प्यारे का दर चाहिए बने जिस में तक़दीर बिगड़ी हुई इलाही मुझे वह हुनर चाहिए हैं दुनिया में लाखों बशर पुरवाहां ख़बर के लिए बे-ख़बर चाहिए ख़ज़ाने से रब के जो चाहो सो लो नबी की ग़ुलामी मगर चाहिए दुआएं तो सालिक बहुत हैं मगर असर के लिए चश्म-ए-तर चाहिए गोश-ए-दिल से मोमिनो सुन लो ज़रा है यह किस्सा फ़ातिमा के अक़्द का पंद्रह साला नबी की लाडली और बाईस साल थी उम्र-ए-अली अक़्द का पैग़ाम हैदर ने दिया मुस्तफ़ा ने मरहबा अहलन कहा पीर का दिन सत्रह माह-ए-रजब दूसरा सन हिजरत-ए-शाह-ए-अरब फिर मदीना में हुआ एलान-ए-आम ज़ुहर के वक़्त आईं सारे ख़ास-ओ-आम इस ख़बर से शोर बरपा हो गया कूचा-ओ-बाज़ार में ग़ुल सा मचा आज है मौला की दुख़्तर का निकाह आज है इस नेक अख़्तर का निकाह आज है इस पाक-ओ-सच्ची का निकाह आज है बे-माँ की बच्ची का निकाह ख़ैर से जब वक़्त आया ज़ुहर का मस्जिद-ए-नबवी में मजमा हो गया एक जानिब हैं अबू बक्र-ओ-उमर इक तरफ़ उस्मान भी हैं जलवा-गर हर तरफ़ असहाब और अंसार हैं दरमियाँ में अहमद-ए-मुख़्तार हैं सामने नौशा अली-ए-मुर्तज़ा हैदर-ए-कर्रार शाह-ए-लाफ़ता आज गोया अर्श आया है उतर या कि क़ुदसी आ गए हैं फ़र्श पर जमा जब यह सारा मजमा हो गया सैयद-उल-कोनैन ने ख़ुत्बा पढ़ा जब हुए ख़ुत्बे से फ़ारिग़ मुस्तफ़ा अक़्द-ए-ज़हरा का अली से कर दिया चार सौ मिस्काल चाँदी मेहर था वज़न जिस का डेढ़ सौ तोला हुआ बाद में ख़ुरमा लटाए ला-कलाम मासिवा इस के न था कोई तआम उन के हक़ में फिर दुआ-ए-ख़ैर की और हर एक ने मुबारकबाद दी घर से रुख़्सत जिस घड़ी ज़हरा हुईं वालिदा की याद में रोने लगें दी तसल्ली अहमद-ए-मुख़्तार ने और फ़रमाया शह-ए-अबरार ने फ़ातिमा हर तरह से बाला हो तुम मैका ओ सुसराल में आला हो तुम बाप तुम्हारे इमाम-उल-अंबिया और शौहर औलिया के पेशवा माह-ए-ज़िलहज्जा में जब रुख़सत हुई तब अली के घर में एक दावत हुई जिस में थीं दस सेर जौ की रोटियां कुछ पनीर और थोड़े खुर-ए-बेगुमां इस ज़ियाफ़त का वलीमा नाम है और ये दावत सुन्नत-ए-इस्लाम है सब को उन की राह चलना चाहिए और बुरी रस्मों से बचना चाहिए