न कोई रुसूख़ ओ असर चाहिए
फ़क़त तेरी सीधी नज़र चाहिए
ज़माने की खूबी ज़माने को दे
मुझे सिर्फ़ दर्द-ए-जिगर चाहिए
रहे जिस में इश्क़-ए-हबीब-ए-ख़ुदा
वह दिल वह जिगर और वह सर चाहिए
कोई राज़ चाहे कोई तख़्त ओ ताज
मुझे तेरे प्यारे का दर चाहिए
बने जिस में तक़दीर बिगड़ी हुई
इलाही मुझे वह हुनर चाहिए
हैं दुनिया में लाखों बशर पुरवाहां
ख़बर के लिए बे-ख़बर चाहिए
ख़ज़ाने से रब के जो चाहो सो लो
नबी की ग़ुलामी मगर चाहिए
दुआएं तो सालिक बहुत हैं मगर
असर के लिए चश्म-ए-तर चाहिए
गोश-ए-दिल से मोमिनो सुन लो ज़रा
है यह किस्सा फ़ातिमा के अक़्द का
पंद्रह साला नबी की लाडली
और बाईस साल थी उम्र-ए-अली
अक़्द का पैग़ाम हैदर ने दिया
मुस्तफ़ा ने मरहबा अहलन कहा
पीर का दिन सत्रह माह-ए-रजब
दूसरा सन हिजरत-ए-शाह-ए-अरब
फिर मदीना में हुआ एलान-ए-आम
ज़ुहर के वक़्त आईं सारे ख़ास-ओ-आम
इस ख़बर से शोर बरपा हो गया
कूचा-ओ-बाज़ार में ग़ुल सा मचा
आज है मौला की दुख़्तर का निकाह
आज है इस नेक अख़्तर का निकाह
आज है इस पाक-ओ-सच्ची का निकाह
आज है बे-माँ की बच्ची का निकाह
ख़ैर से जब वक़्त आया ज़ुहर का
मस्जिद-ए-नबवी में मजमा हो गया
एक जानिब हैं अबू बक्र-ओ-उमर
इक तरफ़ उस्मान भी हैं जलवा-गर
हर तरफ़ असहाब और अंसार हैं
दरमियाँ में अहमद-ए-मुख़्तार हैं
सामने नौशा अली-ए-मुर्तज़ा
हैदर-ए-कर्रार शाह-ए-लाफ़ता
आज गोया अर्श आया है उतर
या कि क़ुदसी आ गए हैं फ़र्श पर
जमा जब यह सारा मजमा हो गया
सैयद-उल-कोनैन ने ख़ुत्बा पढ़ा
जब हुए ख़ुत्बे से फ़ारिग़ मुस्तफ़ा
अक़्द-ए-ज़हरा का अली से कर दिया
चार सौ मिस्काल चाँदी मेहर था
वज़न जिस का डेढ़ सौ तोला हुआ
बाद में ख़ुरमा लटाए ला-कलाम
मासिवा इस के न था कोई तआम
उन के हक़ में फिर दुआ-ए-ख़ैर की
और हर एक ने मुबारकबाद दी
घर से रुख़्सत जिस घड़ी ज़हरा हुईं
वालिदा की याद में रोने लगें
दी तसल्ली अहमद-ए-मुख़्तार ने
और फ़रमाया शह-ए-अबरार ने
फ़ातिमा हर तरह से बाला हो तुम
मैका ओ सुसराल में आला हो तुम
बाप तुम्हारे इमाम-उल-अंबिया
और शौहर औलिया के पेशवा
माह-ए-ज़िलहज्जा में जब रुख़सत हुई
तब अली के घर में एक दावत हुई
जिस में थीं दस सेर जौ की रोटियां
कुछ पनीर और थोड़े खुर-ए-बेगुमां
इस ज़ियाफ़त का वलीमा नाम है
और ये दावत सुन्नत-ए-इस्लाम है
सब को उन की राह चलना चाहिए
और बुरी रस्मों से बचना चाहिए