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Na kyun aaj jhoomein ke sarkar aaye

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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न क्यों आज झूमें के सरकार आए, ख़ुदा की खुदाई के मुख़्तार आए। न क्यों बारहूँ पर हमें प्यार आए, के आए इसी रोज़ सरकार आए। वो आए दो-आलम के मुख़्तार आए, लो आज आए उम्मत के ग़मख्वार आए। मुसर्रत से हम क्यों न धूमें मचाएं, हमारे शहंशाह-ओ-सरदार आए। मुसलमानो! सुब्ह-ए-बहारां मुबारक, वो बरसाते अनवार सरकार आए। मुबारक तुझे आमना हो मुबारक, तेरे घर शहंशाह-ए-अबरार आए। मुबारक हलीमा तुझे भी मुबारक, तेरे घर में नबियों के सरदार आए। मुबारक तुम्हें ग़म के मारो मुबारक, मदावा-ए-ग़म बन के ग़मख्वार आए। सवाल अपनी उम्मत की बख्शिश का करते, वो हम आसियों के तरफ़दार आए। यतीमों के वाली ग़रीबों के हामी, वो आफ़त-ज़दों के मददगार आए। मुसीबत के मारों की ढांरस बंधाने, शिकस्ता दिलों के ख़रीदार आए। सियाही हमारे गुनाहों की धोने, बहाते हुए अश्क-ए-सरकार आए। जहाँ में वो सुख बिठाने को दीन का, मिटाने वो बातिल के आसार आए। न क्यों आज जश्न-ए-विलादत मनाएं, नज़र रब की रहमत के आसार आए। अदू हम को बारह का क्यों न प्यारा, के बारह को दुनिया में सरकार आए। घटा छा गई हर तरफ़ रहमतों की, वो लहराते गेसू-ए-खुमदार आए। चलो ऐ गदाओ! चलो बे-नवाओ, लुटाते वो नेमत के अंबार आए। दरूदों के गजरे लिए अब बढ़ो तुम, वो आए रसूलों के सालार आए। नहीं जिन की प्यारी ज़बान पर नहीं है, वो मक्के में सखियों के सरदार आए। विलादत का सदक़ा जियों में जहाँ तक, न नज़दीक दुनिया-ए-बेकार आए। विलादत का सदक़ा हमें अपना ग़म दो, शहाबा चश्म-ए-नम के तलबगार आए। विलादत का सदक़ा हो अख़्लाक़ अच्छा, न हम को किसी शाह बेकार आए। विलादत का सदक़ा गुनाहों से नफ़रत, हो, अच्छाइयों पर मुझे प्यार आए। विलादत का सदक़ा बक़ी-ए-मुबारक, की दो गज़ ज़मीं के तलबगार आए। विलादत का सदक़ा हूँ पाबंद-ए-सुन्नत, हमें आर फ़ैशन से सरकार आए। विलादत का सदक़ा बयां में असर दो, हो इस्लाह इस की जो बदकार आए। विलादत का सदक़ा मदीने में आका, मुझे मौत ऐ मेरे सरकार आए। विलादत का सदक़ा नक़ाब अब उठा दो, लिए हम सब उम्मीद-ए-दीदार आए। विलादत का सदक़ा जगह बहर-ए-मरकज़, मिले यह अर्ज़ सरकार आए। विलादत का सदक़ा पड़ोसी बनाना, शहाबा ख़ल्द में जब यह बदकार आए। विलादत का सदक़ा शहाबा ज़िंदगी भर, मदीने में हर साल अत्तार आए।