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Nabi Sarwar-e-Har Rasool-o-Wali Hai

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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नबी सरवरे हर रसूल ओ वली है नबी राज़े म-अल्लाहि ली है वो नामी के नामे ख़ुदा नाम तेरा रऊफ़ ओ रहीम ओ अलीम ओ अली है है बेताब जिस के लिए अर्शे आज़म वो उस रहरोए ला-मकाँ की गली है नकीरैन करते हैं ताज़ीम मेरी फ़िदा हो के तुझ पर ये इज़्ज़त मिली है तुलतुम है कश्ती पे तूफ़ाने ग़म का ये कैसी हवाए मुखालिफ चली है ना क्यों कर कहूँ या हबीबी अग़िसनी इसी नाम से हर मुसीबत टली है सबा है सरसरे दश्ते तय्यबा इसी से कली मेरे दिल की खुली है तेरे चारों हमदम हैं यक जाँ यक दिल अबू बकर, फ़ारूक़, उस्मान, अली है ख़ुदा ने किया तुझ को आगाह सब से दो आलम में जो कुछ ख़फ़ी ओ जली है करूँ अर्ज़ क्या तुझ से ऐ आलिमे सिर के तुझ पर मेरी हालते दिल खुली है तमन्ना है फ़रमाए रोज़े महशर ये तेरी रिहाई की चिट्ठी मिली है जो मक़सद ज़ियारत का बर आए फिर तो ना कुछ क़स्द कीजिए ये क़स्दे दिली है तेरे दर का दरबाँ है जिब्रीले आज़म तेरा मदह ख़्वाँ हर नबी ओ वली है शफ़ाअत करे हश्र में जो रज़ा की सिवा तेरे किस को ये क़ुदरत मिली है