नज़ारा हो दरबार का ग़ौस-ए-आज़म दिखा नीला गुंबद दिखा ग़ौस-ए-आज़म
मुझे जाम-ए-उल्फत पिला ग़ौस-ए-आज़म रहूँ मस्त-ओ-बे-खुद सदा ग़ौस-ए-आज़म
करम कीजिये फिर मैं बग़दाद आऊँ मरे पीर का वास्ता ग़ौस-ए-आज़म
मुझे अपनी चौखट का कुत्ता बना लो हमेशा रहूँ बा-वफ़ा ग़ौस-ए-आज़म
तेरे आस्ताँ का हूँ मंगता गुज़ारा है टुकड़ों पे तेरे मरा ग़ौस-ए-आज़म
गुनाहों का बार अपने सर पर उठा कर फिरूँ कब तलक जा-बजा ग़ौस-ए-आज़म
इलाज आख़िर-ए-ऐ मुर्शदी कब करेंगे! गुनाहों के बीमार का ग़ौस-ए-आज़म
गुनहगार हूँ गर अज़ाबों ने घेरा तो होगा मरा हाय! क्या ग़ौस-ए-आज़म
नज़र मुर्शदी तेरी जानिब लगी है अज़ाबों से लेना बचा ग़ौस-ए-आज़म
जहाँ में जियूँ सुन्नतों के मुताबिक मदीने में हो ख़ात्मा ग़ौस-ए-आज़म
हो अत्तार की बे-सबब बख़्शिश आक़ा ये फ़र्माएं हक़ से दुआ ग़ौस-ए-आज़म