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पाऊँ वह आँख तुझ से ऐ परवरदिगार में

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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पाऊँ वह आँख तुझ से ऐ परवरदिगार में रोता रहूँ ग़म-ए-नबी में ज़ार ज़ार में दिन रात हिज्र-ए-शाह में आहें भरा करूँ रोया करूँ फ़िराक़ में ज़ार-ओ-क़तार में कहना न हज मुबारक ऐ अहल-ए-वतन मुझे हाए फ़िराक़-ए-तय्यबा से हूँ दिलफ़गार में दाग़-ए-मुफ़ारक़त जो मिला काश! अब ऐसा हो रोया करूँ फ़िराक़ में ज़ार-ओ-क़तार में सीना तपाँ अता हो मिले क़ल्ब-ए-मुज़्तरिब ग़म में तुम्हारे काश! रहूँ बेक़रार में दश्त-ए-हरम पे वारी मैं, क़ुमरी चमन पे तू तू फूल ले के तय्यबा का लेता हूँ ख़ार में वह दिन अब आए ख़ैर से यारब-ए-मुस्तफ़ा सू-ए-मदीना चल पड़ूँ फिर अश्कबार में जूँ ही मुझे हबीब का जलवा नसीब हो ऐ काश! जान उस घड़ी कर दूँ शुमार में ज़ुहद-ओ-वरअ में या नबी तुम बे-मिसाल हो बे-हद गुनाहगार में इस्यान शआर में गुम हो के इश्क़-ए-मुस्तफ़ा में ऐ ख़ुदा-ए-पाक करता रहूँ ब्यान सदा अश्कबार में तब्लीग़-ए-दीन के लिए दर दर फिरूँ ऐ काश! तालिब हूँ ऐसे वलवले का किरदार में अत्तार नेकियाँ न थीं ज़ाद-ए-सफ़र में कुछ ले कर गया था दर पे बस अश्कों का बार में