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Phir Madine ki fazayein pa gaya

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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फिर मदीने की फ़ज़ाएँ पा गया या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया अपने सर पर लाद कर बार-ए-गुनाह या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया आह! पल्ले नेकियाँ कुछ भी नहीं या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया उस के नामे की सियाही दूर हो या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया नेकियों से वो बदल उस के गुनाह या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया दीजिये उस को शफ़ाअत की सनद या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया अज़ पये ग़ौस ओ रज़ा हो मग़फ़िरत या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया सदक़ा शहज़ादों का हो चश्म-ए-करम या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया ले कर उमीद-ए-करम जान-ए-करम या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया वास्ता ज़हरा का दो ख़ुल्द-ए-बरीं या रसूलल्लाह मुजरिम आ गया उस को भी तुम तो लगाते हो गले जिस को हर दरवाज़े से था लाया ऐ मेरे सरवर अता हो चश्म-ए-तर भीक लेने दर पे मंगता आ गया क़ल्ब-ए-मुज़्तर का सवाली हूँ शहा! भीक लेने दर पे मंगता आ गया दीजिये सोज़-ए-जिगर सुल्तान-ए-दीं! भीक लेने दर पे मंगता आ गया मेरा सीना ही मदीना दो बना भीक लेने दर पे मंगता आ गया या नबी क़ुफ़्ल-ए-मदीना दीजिये भीक लेने दर पे मंगता आ गया सैयदी! अख़लाक़ अच्छे कीजिये भीक लेने दर पे मंगता आ गया ले के कशकोल आप के दरबार में भीक लेने दर पे मंगता आ गया दूर हो जाए गुनाहों का मर्ज़ भीक लेने दर पे मंगता आ गया दो बना मुझ को पसंदीदा ग़ुलाम भीक लेने दर पे मंगता आ गया दौलत-ए-इख़लास हो आक़ा अता भीक लेने दर पे मंगता आ गया आप की नज़र-ए-करम ही पड़ी अबर-ए-रहमत मेरे सर पर छा गया अल-मदद ऐ आमना के लाडले हाय! मुझ पर नफ़्स ग़ालिब आ गया बद्र-ए-कामिल देख कर तलवार अतरा फ़क़ हुआ फीका पड़ा शरमा गया अल्लाह अल्लाह! आप का हुस्न ओ जमाल दोस्त क्या दुश्मन के दिल को भा गया दुश्मन-ए-महबूब अबू जहल लईं बद्र में रुस्वा हुआ मारा गया गुलशन-ए-आलम की क्या देखें बहार मेरे दिल को दश्त-ए-तैबा भा गया नाख़ुन-ए-पा की ज़ियाएँ मरहबा ये हिलाल-ए-ईद भी शरमा गया सब्ज़ गुम्बद की बहारें देख लो आँख खोलो देखो रौज़ा आ गया ले के पलटा उन से माँगी मुराद जो कोई दरबार में मंगता आ गया क़ाफ़िला सू-ए-मदीना जब चला लब पे नअतों का तराना आ गया चाँद दो टुकड़े हुआ सदक़े गया जब इशारा मुस्तफ़ा का पा गया पाक मरज़ी-ए-सरवर-ए-कौनैन की डूबा सूरज फिर पलट कर आ गया मरहबा सल्लि अला का शोर उठा हश्र में जब उन का दीवाना आ गया नाज़ उठाए थे जहाँ में जिस के वो हश्र में नाज़ों का पाला आ गया हश्र में उन के गदा को देख कर ख़ुद जहन्नम को पसीना आ गया आँख ठंडी हो तेरे दीदार से तालिब-ए-दीदार दर पर आ गया शोर उठा महशर में ये चारों तरफ आ गया आक़ा, आ गया उन का आ गया