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Phir Utha Walwala-e-Yad-e-Moghilan-e-Arab

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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फिर उठा वलवला-ए-याद-ए-मगीलान-ए-अरब फिर खिंचा दामन-ए-दिल सू-ए-बयाबान-ए-अरब बाग़-ए-फ़िरदौस को जाते हैं हज़ारान-ए-अरब हाए सहरा-ए-अरब हाए बयाबान-ए-अरब मीठी बातें तेरी दीन-ए-अजम ईमान-ए-अरब नमकीं हुस्न तेरा जान-ए-अजम शान-ए-अरब अब तो है गिर्या-ए-ख़ूं गौहर-ए-दामान-ए-अरब जिस में दो लअल थे ज़हरा के वो थी कान-ए-अरब दिल वही दिल है जो आँखों से हो हैरान-ए-अरब आँखें वो आँखें हैं जो दिल से हों क़ुर्बान-ए-अरब हाए किस वक़्त लगी फांस-ए-अलम की दिल में कि बहुत दूर रहे ख़ार-ए-मगीलान-ए-अरब फ़ज़्ल-ए-गुल लाख न हो वस्ल की रख आस हज़ार फूलते फलते हैं बे-फ़ज़्ल गुलिस्तान-ए-अरब सदक़े होने को चले आते हैं लाखों गुलज़ार कुछ अजब रंग से फूला है गुलस्ताने-अरब उन्दलीबी पे झगड़ते हैं कटे मरते हैं गुल-ओ-बुलबुल को लड़ाता है गुलस्ताने-अरब सदक़े रहमत के कहाँ फूल कहाँ ख़ार का काम ख़ुद है दामन-कश-ए-बुलबुल गुल-ए-ख़न्दाने-अरब शादिये-हश्र है सदक़े में छुटेंगे क़ैदी अर्श पर धूम से है दवते-मेहमाने-अरब चर्चे होते हैं ये कुम्हलाए हुए फूलों में क्यों ये दिन देखते पाते जो बयाबाने-अरब तेरे बे-दाम के बंदे हैं रईसाने-अजम तेरे बे-दाम के बंदी हैं हज़ारान-ए-अरब हुश्त ख़ुल्द आएँ वहाँ कस्बे-लताफ़त को रज़ा चार दिन बरसे जहाँ अब्रे-बहाराने-अरब