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Rah-e-Irfan se jo hum nadeeda-e-ru mehram nahin

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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राह-ए-इरफ़ान से जो हम नादीदा-ए-रू महरम नहीं मुस्तफ़ा है मसनद-ए-इरशाद पर कुछ ग़म नहीं हूँ मुसलमान गरचे नाक़िस ही सही ऐ कामलो! माहियत पानी की आख़िर-इम से नम में कम नहीं ग़ुन्चे मा-अव्हा के जो चटके बाग़ में बुलबुल-ए-सिदरा तक उन की बू से भी महरम नहीं उस में ज़म-ज़म है कि थम-थम उस में जम-जम है कि बेश कसरत-ए-कौसर में ज़म-ज़म की तरह कम-कम नहीं पंजा-ए-मेहर-ए-अरब है जिस से दरिया बह गए चश्मा-ए-खुर्शीद में तो नाम को भी नम नहीं ऐसा उम्मी किस लिए मिन्नत-कश-ए-उस्ताद हो क्या किफायत उस को इक़रा रब्बुकल अकरम नहीं उस मेहर-ए-हशर पर पड़ जाए प्यासो तो सही उस गुल-ए-ख़ंदां का रोना गिरया-ए-शबनम नहीं है उन्हीं के दम-ए-क़दम की बाग़-ए-आलम में बहार वो न थे आलम न था गर वो न हों आलम नहीं साया-ए-दीवार-ओ-ख़ाक-ए-दर हो या रब्ब और रज़ा ख्वाहिश-ए-दुहीम-ए-क़ैसर, शौक़-ए-तख़्त-ए-जम नहीं