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रौनक-ए-बज़्म-ए-जहान हैं आशिक़ान-ए-सोख़्ता

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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रौनक-ए-बज़्म-ए-जहान हैं आशिक़ान-ए-सोख़्ता कह रही है शम्मा की गोया ज़बान-ए-सोख़्ता जिस को क़ुर्स-ए-मेहर समझा है जहान ऐ मुन-इमो! उन के ख़्वान-ए-जूड से है एक नान-ए-सोख़्ता माह-ए-मन यह नय्यर-ए-महशर की गर्मी ता-बके आतिश-ए-इस्यान में ख़ुद जलती है जान-ए-सोख़्ता बर्क़-ए-अंगुश्त-ए-नबी चमकी थी उस पर एक बार आज तक है सीना-ए-मह में निशान-ए-सोख़्ता मेहर-ए-आलम ताब झुकता है पए तस्लीम-ए-रोज़ पेश-ए-ज़र्रात-ए-मज़ार-ए-बेदिलान-ए-सोख़्ता गोचा-ए-गेसू-ए-जानां से चले ठंडी नसीम बाल-ओ-पर अफशां हों या रब बुलबुलान-ए-सोख़्ता बहर-ए-हक़ ऐ बहर-ए-रहमत एक निगाह-ए-लुत्फ-ए-बार ता-बके बे-आब तड़पें माहियान-ए-सोख़्ता रूकश-ए-ख़ुर्शीद-ए-महशर हो तुम्हारे फ़ैज़ से एक शरार-ए-सीना-ए-शायदाइयान-ए-सोख़्ता आतिश-ए-तर दामनी ने दिल किए क्या कबाब ख़िज़्र की जान हो जला दो माहियान-ए-सोख़्ता आतिश-ए-गुलहा-ए-तैयबा पर जलाने के लिए जान के तालिब हैं प्यारे बुलबुलान-ए-सोख़्ता लुत्फ-ए-बर्क़-ए-जल्वा-ए-मेराज लाया वज्द में शोला-ए-जवाला सां है आसमान-ए-सोख़्ता ऐ रज़ा मज़मून-ए-सोज़-ए-दिल की रिफ़अत ने किया इस ज़मीन-ए-सोख़्ता को आसमान-ए-सोख़्ता