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सआदते-आबे मदीने की अता हो

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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सआदते अब मदीने की अता हो करम चश्मे-करम या मुस्तफ़ा हो मदीने की बहारें देखने की इजाज़त मरहमते अब तो शहा हो वो लम्हाते-मुसर्रत आएं फिर से मेरे पेशे-नज़र गुम्बदे-हरा हो सदा दिल इश्क़ में तड़पा करे और ये तारे-अश्कों का आँखों से बंधा हो सुनहरी जालियों के रूबरू काश! मेरा जलवों में उन के ख़ातिमा हो मेरे आक़ा! बराए पीरो-मुर्शिद बक़ीए-पाक में मदफ़न अता हो जब आक़ा क़ब्र में जलवा-नुमा हों तो लब पर "मरहबा या मुस्तफ़ा" हो मोहब्बत माल की छुटती नहीं है करम! दुनिया से मेरा दिल बुरा हो मैं ऐसा आशिके-सादिक़ बनूं काश! हंसी लब पर रहे दिल रो रहा हो गुनाहों के सभी अमराज़ हों दूर अता मेरे तबीब ऐसी दवा हो कलेजे से लगाते हैं उसे भी जिसे हर एक ने ठुकरा दिया हो पड़ोसी ख़ुल्द में अपना बना लो करम आक़ा पये अहमद रज़ा हो जगह जन्नत में वो देना जहां पर मुर्शिदी अहमद रज़ा हो मेरी क़िस्मत की जितनी गुत्थियां हैं सुलझ सकती हैं आक़ा तुम जो चाहो अदू उस का बिगाड़ेगा भला क्या! मुहम्मदे-मुस्तफ़ा का जो गदा हो इनायत दीन पर हो इस्तक़ामत मेरी मक़बूल या रब ये दुआ हो ख़ुदाया वास्ता मीठे नबी का शरफ़ अत्तार को हज्ज का अता हो