Sar Ho Chaukhat Pe Kham, Tajdar-e-Haram
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
सर हो चौखट पे ख़म, ताजदार-ए-हरम
ये निकल जाये दम, ताजदार-ए-हरम
ये रहा मेरा सर, सीना क़ल्ब-ओ-जिगर
रख दो आक़ा क़दम, ताजदार-ए-हरम
हाज़री का सबब, हो ऐ माह-ए-अरब!
आएँ तैयबा में हम, ताजदार-ए-हरम
हर बरस हज करूँ, गिर्द-ए-काबा फिरूँ
या शह-ए-मोहतरम, ताजदार-ए-हरम
दीद-ए-ख़स्ता जिगर, कर दो शोरिदा सर
अपना जान-ए-करम, ताजदार-ए-हरम
जो कि बहती रहे, दर्द कहती रहे
दीद वो चश्म-ए-नम, ताजदार-ए-हरम
आये ख़्वाब में, क़ल्ब-ए-बेताब में
सरवर-ए-मोहतरम, ताजदार-ए-हरम
कर के इज़हार-ए-ठीक, इस्तक़ामत की भीख
दीद-ओ-शाह-ए-हरम, ताजदार-ए-हरम
सब ख़तायें मुआफ़, और नामा हो साफ़
पाऊँ बाग़-ए-इरम, ताजदार-ए-हरम
पढ़ ले तहरीर जो, उस की इस्लाह हो
दीदो ऐसा क़लम, ताजदार-ए-हरम
आमना के पिसर, खैर से हों बशर
ज़ीश्त के बीच-ओ-खम, ताजदार-ए-हरम
मेरे माह-ए-मीं जो हैं अंदोह-गीं
उन के हों दूर ग़म, ताजदार-ए-हरम
हसिदों के हसद, की नहीं कोई हद
अब तो कर दो करम, ताजदार-ए-हरम
या नबी ताइके, हाय कुफ़्फ़ार के
हम सहें गे सितम, ताजदार-ए-हरम
अज़ तुफ़ैल-ए-रज़ा, ख़श्म हों सरवरा
दुश्मनों के सितम, ताजदार-ए-हरम
ऐ मेरे ताजवर, दूर हों सारे शर
हो निगाह-ए-करम, ताजदार-ए-हरम
हों बड़ा रू-सियाह, है गुनाह पर गुनाह
हो निगाह-ए-करम, ताजदार-ए-हरम
खोलो रहमत के पट, जाए ज़ुल्मत पलट
हो निगाह-ए-करम, ताजदार-ए-हरम
तेरे अत्तार का, है ये अरमाँ शहा
निकले तैयबा में दम, ताजदार-ए-हरम