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Sarwar kahoon ke Maalik-o-Maula kahoon tujhe

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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सरवर कहूं कि मालिक-ओ-मौला कहूं तुझे बाग़-ए-ख़लील का गुल-ए-ज़ेबा कहूं तुझे हुरमां नसीब हूं तुझे उमीद-गाह कहूं जान-ए-मुराद-ओ-कान-ए-तमन्ना कहूं तुझे गुलज़ार-ए-क़ुदस का गुल-ए-रंगीं अदा कहूं दरमां-ए-दर्द-ए-बुलबुल-ए-शीदा कहूं तुझे सुब्ह-ए-वतन पे शाम-ए-ग़रीबां को दूं शरफ़ बे-कस नवाज़ गेसूओं वाला कहूं तुझे अल्लाह रे तेरे जिस्म-ए-मुनव्वर की ताबिशें ऐ जान-ए-जां में जान-ए-तजल्ला कहूं तुझे बे-दाग़ लाला या क़मर-ए-बे-कलफ़ कहूं बे-ख़ार गुलबन-ए-चमन आरा कहूं तुझे मुजरिम हूँ अपने अफ़्व का सामाँ करूँ शहा यानी शफ़ी-ए-रोज़-ए-जज़ा को कहूँ तुझे इस मुर्दा दिल को मुज़्दा-ए-हयात-ए-अबद का दूँ ताब-ओ-तवान-ए-जान-ए-मसीहा कहूँ तुझे तेरे तो वस्फ़ ऐब-ए-तनाही से हैं बरी हैराँ हूँ मेरे शाह मैं क्या क्या कहूँ तुझे कह लेगी सब कुछ उन के सना-ख्वाँ की ख़ामोशी चुप हो रहा है कह के मैं क्या क्या कहूँ तुझे लेकिन रज़ा ने ख़त्म-ए-सुख़न इस पे कर दिया ख़ालिक़ का बंदा ख़ल्क़ का आक़ा कहूँ तुझे