सहरा-ए-मदीना

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

100%
या रब मरे दिल में है तमन्ना-ए-मदीना इन आँखों से दिखला मुझे सहरा-ए-मदीना निकले न कभी दिल से तमन्ना-ए-मदीना सर में रहे या रब मरे सौदा-ए-मदीना हर ज़र्रा में है नूर-ए-तजला-ए-मदीना है मख़ज़न-ए-असरार सरापा-ए-मदीना ऐसा मरी नज़रों में समा जाए मदीना जब आँख उठाऊं तो नज़र आए मदीना फिरते हैं यहां हिन्द में हम बे-सरो सामान तैयबा में बुला लो हमें आक़ा-ए-मदीना इस दर्जा हैं मुश्ताक़-ए-ज़ियारत मरी आँखें दिल से यह निकलती है सदा हाय मदीना याद आता है जब रौज़ा-ए-पुरनूर का गुम्बद दिल से यह निकलती है सदा हाय मदीना मैं विज्द के आलम में करूं चाक-ए-गरीबां आँखों के मरे सामने जब आए मदीना क्यों न झुकें ख़ल्क के दिल उस की तरफ को है अर्श-ए-इलाही भी तो जू-ए-मदीना सर-ए-अर्श का ख़म है तेरे रौज़े के मुक़ाबिल अफ़लाक से ऊंचे हैं मकां हाय मदीना तैयबा की ज़मीं झाड़ते आते हैं मलाइक जिब्रील के पर फ़र्श-ए-मुअल्ला-ए-मदीना क़ुरआन क़सम खाता न उस शहर की हरगिज़ गर होता न वो गुल चमन आरा-ए-मदीना