शाह-ए-बतहा का माह-पारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
शाह-ए-बतहा का माह-पारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
सैय्यदा फ़ातिमा का प्यारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
ये तो सब औलिया का अफ़्सर है, इब्न-ए-ज़हरा है इब्न-ए-हैदर है
और हुसनैन का दुलारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
गौस-ए-आज़म हैं शाह-ए-जिलानी, पीर-ए-ला-सानी, कुत्ब-ए-रब्बानी
उन के उश्शाक ने पुकारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
शहर-ए-बग़दाद मुझ को है प्यारा, ख़ूब दिलकश वहां का नज़ारा
मेरा मुर्शद जो जलवा-आरा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
मिल गया मुझ को गौस का दामन, फ़ज़्ल-ए-रब्ब-ए-करीम से रौशन
मेरी तक़दीर का सितारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
जब कि दुनिया में मुर्शदी आए, बत्न-ए-मादर से ही वली आए
जान-ओ-दिल उन पे सब निसारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
मेरे मुर्शद ने 'ला तक़फ़' कह कर, दूर सब कर दिया है ख़ौफ़ और डर
उन का महशर में भी सहारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
गौस रंज-ओ-अलम मिटाते हैं, उस को सीने से भी लगाते हैं
आ गया जो भी ग़म का मारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
गौस पीरों के पीर हैं बेशक, और रौशन ज़मीर हैं बेशक
हाल-ए-दिल उन पे आशकारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
क्यों न जाऊं मैं गौस परवारी, आफ़तें दूर हो गईं सारी
जब तड़प कर उन्हें पुकारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
उस को मन की मुराद मिलती है, उस की बिगड़ी ज़रूर बनती है
जिस ने दामन यहां पसारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
जी उठे मुर्दे हक़ की क़ुदरत से, हुक्म-ए-वाला-ए-रब्ब-ए-रहमत से
रब्ब को जब गौस ने पुकारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
दर्द-ओ-आलम जब रुलाते हैं, गौस-ए-आज़म मदद को आते हैं
हर जगह गौस का सहारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
उन का दुश्मन ख़ुदा का है मक़हूर, उस की रहमत से हो गया वो दूर
बुग़्ज़ में जिस ने सर उभारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
गौस पर तो क़दम नबी का है, उन के ज़ेर-ए-क़दम वली सारे
हर वली ने यही पुकारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
हम को 'ग्यारह' का है अदद प्यारा, उन की तारीख़-ए-उर्स है ग्यारह
यूं अदद हम को प्यारा ग्यारह है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की
ख़ूब सूरत हैं गुम्बद और मीनार, उन पे रहमत बरसती है अत्तार
ख़ूब दरबार का नज़ारा है, वाह क्या बात गौस-ए-आज़म की