Home/Imam Ahmad Raza Khan Qadri/Sunte hain ke mehshar mein sirf unki rasai hai

Sunte hain ke mehshar mein sirf unki rasai hai

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

100%
सुनते हैं कि महशर में सिर्फ उन की रसाई है गरां उन की रसाई है जो जब तो बन आई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बंधाई है क्या बात तेरी मुजरिम क्या बात बनाई है सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बे-कसों के आक़ा अब तेरी दुहाई है यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो यह टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है ज़ाइर गए भी कब के दिन ढलने पे है प्यारे उठ मेरे अकेले चल क्या देर लगाई है बाज़ार-ए-अमल में तो सौदा न बना अपना सरकार करम तुझ में ऐबी की समाई है गिरते हुओं को मुज़दा सजदे में गिरे मौला रो रो के शफ़ाअत की तम्हीद उठाई है ऐ दिल यह सुलगना क्या जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा ज़ालिम क्या धूनी रमाई है मुजरिम को न शर्माओ अहबाब कफन ढक दो मुँह देख के क्या होगा पर्दे में भलाई है अब आप ही संभालें तो काम अपने संभल जाएँ हम ने तो कमाई सब खेलों में गँवाई है ऐ इश्क तेरे सदक़े जलने से छूटे सस्ते जो आग बुझा देगी वो आग लगाई है हर्स-ओ-हवस-ए-बद से दिल तू भी सितम कर ले तू ही नहीं बेगाना दुनिया ही पराई है हम दिल जले हैं किस के हट फितनों के पर काले क्यों फूँक दूँ एक उफ़ से क्या आग लगाई है तैबा न सही अफ़ज़ल मक्का ही बड़ा ज़ाहिद हम इश्क के बंदे हैं क्यों बात बढ़ाई है मतला में यह शक क्या था वल्लाह रज़ा वल्लाह सिर्फ उन की रसाई है सिर्फ उन की रसाई है