तैयबा के मुसाफिर मुझे तो भूल न जाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
रो रो के नबी को मेरी रुदाद सुनाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
हो मुझ पे करम सदके में सुलतान-ए-दुना के
दिखला दे मनाज़िर मुझे अरफात ओ मिना के
कहता था फिर अल्लाह मुझे हज पे बुलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
बेचारा मदीने से बहुत दूर पड़ा है
बदकार सही पर तेरा दीवाना बड़ा है
कहता था मुझे हाज़िरी का इज़्न दिलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
कहना बड़ा अरसा हुआ तैयबा नहीं पहुँचा
बरसों से नहीं देख सका गुम्बद-ए-खज़रा
मिस्कीन को अब कदमों में सरकार बुलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
ऐ राह-ए-मदीना के मुसाफिर तू ठहर कर
मजबूर की बीता ज़रा सुन कान को धर कर
कर हक से दुआ रंज ओ अलम इसके मिटाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
तू रब का है मेहमान रह-ए-जानाँ का है आज़म
मैं सख्त गुनहगार ओ खता कार हूँ मुजरिम
अल्लाह से कर अर्ज़ इसे दोज़ख से बचाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
अल्लाह के घर का जूँ ही देखे तू द्वारा
जिस वक़्त कि काबे का करे पहला नज़ारा
गर होश हों तेरे मुझको न भुलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
रो रो के तू करना मेरे हक में ये दुआएँ
बोले न फज़ूल और रखे नीची निगाहें
कर अर्ज़ खुदा से तू इसे नेक बनाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
बहकाता है शैतान तू है नफ्स सताना
तौबा भी बहुत करता है पर पहुँच नहीं पाता
कर हक से दुआ इसको गुनाहों से बचाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
सकरात के सदमे मेरे बस में नहीं सहना
कहता था: तू सरकार से रो रो के ये कहना
जलवा भी दिखाना मुझे कलमा भी पढ़ाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
कहता था बुरे खात्मे का खौफ बड़ा है
देख है इसे बारहा ये रो भी पड़ा है
यारब इसे ईमान पे दुनिया से उठाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
नादिम है मज़ीद इसको तू शर्मिंदा न करना
बे-पूछे ही दे बख्श कयामत में न धरना
कर अर्ज़ खुदा से इसे जन्नत में बसाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
जब तक हो मदीने में मयस्सर तुझे रहना
रो रो के सलाम उन से मेरा रोज़ तू कहना
खैरात-ए-शफाअत की तबर्रुक में ले आना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
इखलास की अल्लाह इसे कर दे अता भीक
और गुस्से की आदत टले अखलाक भी हों ठीक
हुनैन के सदके इसे हंस मुख तू बनाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
छाई है मेरे रुख पे गुनाहों की सियाही
मकसूम न हो जाए कहीं भाई तबाही
कर अर्ज़, उन्हें आता है तकदीर बनाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
कहना कि नदामत इसे इज़ियां पे बड़ी है
दहलीज़ पे मौत आ के शहा इसके खड़ी है
तुम नज़अ में दीदार का जाम इसको पिलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
कहता था कराची में नहीं मुझको है मरना
रो रो के गुज़ारिश तू ये सरकार से करना
सुलतान-ए-मदीना इसे कदमों में सुलाना
ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
तू दावत-ए-इस्लामी के हक़ में ये दुआ दे
इस्लाम का डंका ये ज़माने में बजा दे
फ़रमाएं करम उस पे शहंशाह-ए-ज़माना
ऐ आज़म-ए-तैबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ
जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा को नज़र झूम के चूमे
आजाए तुझे वज्द तू बे-साख़्ता झूमे
कहना: कहें, अत्तार हमारा है दीवाना
ऐ आज़म-ए-तैबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ