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Taiba ke musafir mujhe toh bhool na jana, aye azim-e-Taiba! main talabgar-e-dua hoon

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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तैयबा के मुसाफिर मुझे तो भूल न जाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ रो रो के नबी को मेरी रुदाद सुनाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ हो मुझ पे करम सदके में सुलतान-ए-दुना के दिखला दे मनाज़िर मुझे अरफात ओ मिना के कहता था फिर अल्लाह मुझे हज पे बुलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ बेचारा मदीने से बहुत दूर पड़ा है बदकार सही पर तेरा दीवाना बड़ा है कहता था मुझे हाज़िरी का इज़्न दिलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ कहना बड़ा अरसा हुआ तैयबा नहीं पहुँचा बरसों से नहीं देख सका गुम्बद-ए-खज़रा मिस्कीन को अब कदमों में सरकार बुलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ ऐ राह-ए-मदीना के मुसाफिर तू ठहर कर मजबूर की बीता ज़रा सुन कान को धर कर कर हक से दुआ रंज ओ अलम इसके मिटाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ तू रब का है मेहमान रह-ए-जानाँ का है आज़म मैं सख्त गुनहगार ओ खता कार हूँ मुजरिम अल्लाह से कर अर्ज़ इसे दोज़ख से बचाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ अल्लाह के घर का जूँ ही देखे तू द्वारा जिस वक़्त कि काबे का करे पहला नज़ारा गर होश हों तेरे मुझको न भुलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ रो रो के तू करना मेरे हक में ये दुआएँ बोले न फज़ूल और रखे नीची निगाहें कर अर्ज़ खुदा से तू इसे नेक बनाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ बहकाता है शैतान तू है नफ्स सताना तौबा भी बहुत करता है पर पहुँच नहीं पाता कर हक से दुआ इसको गुनाहों से बचाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ सकरात के सदमे मेरे बस में नहीं सहना कहता था: तू सरकार से रो रो के ये कहना जलवा भी दिखाना मुझे कलमा भी पढ़ाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ कहता था बुरे खात्मे का खौफ बड़ा है देख है इसे बारहा ये रो भी पड़ा है यारब इसे ईमान पे दुनिया से उठाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ नादिम है मज़ीद इसको तू शर्मिंदा न करना बे-पूछे ही दे बख्श कयामत में न धरना कर अर्ज़ खुदा से इसे जन्नत में बसाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ जब तक हो मदीने में मयस्सर तुझे रहना रो रो के सलाम उन से मेरा रोज़ तू कहना खैरात-ए-शफाअत की तबर्रुक में ले आना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ इखलास की अल्लाह इसे कर दे अता भीक और गुस्से की आदत टले अखलाक भी हों ठीक हुनैन के सदके इसे हंस मुख तू बनाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ छाई है मेरे रुख पे गुनाहों की सियाही मकसूम न हो जाए कहीं भाई तबाही कर अर्ज़, उन्हें आता है तकदीर बनाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ कहना कि नदामत इसे इज़ियां पे बड़ी है दहलीज़ पे मौत आ के शहा इसके खड़ी है तुम नज़अ में दीदार का जाम इसको पिलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ कहता था कराची में नहीं मुझको है मरना रो रो के गुज़ारिश तू ये सरकार से करना सुलतान-ए-मदीना इसे कदमों में सुलाना ऐ आज़म-ए-तैयबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ तू दावत-ए-इस्लामी के हक़ में ये दुआ दे इस्लाम का डंका ये ज़माने में बजा दे फ़रमाएं करम उस पे शहंशाह-ए-ज़माना ऐ आज़म-ए-तैबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ जब गुम्बद-ए-ख़ज़रा को नज़र झूम के चूमे आजाए तुझे वज्द तू बे-साख़्ता झूमे कहना: कहें, अत्तार हमारा है दीवाना ऐ आज़म-ए-तैबा! मैं तलबगार-ए-दुआ हूँ