तू ने बातिल को मिटाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
दीन का डंका बजाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
ज़ोर-ए-बातिल का, ज़लालत का था जिस दम हिन्द में
तू मुजद्दिद बन के आया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
अहल-ए-सुन्नत का चमन सरसब्ज़ था शादाब था
ताज़गी तू और लाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
तू ने बातिल को मिटा कर दीन को बख़्शी जला
सुन्नतों को फिर जलाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
ऐ इमाम-ए-अहल-ए-सुन्नत नायब-ए-शाह-ए-उमम
कीजिये हम पर भी साया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
इल्म का चश्मा हुआ है मौजज़न तहरीर में
जब क़लम तू ने उठाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
हश्र तक जारी रहे गा फ़ैज़-ए-मुर्शिद आप का
फ़ैज़ का दरिया बहाया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा
है बदरगाह-ए-ख़ुदा अत्तार-ए-आजिज़ की दुआ
तुझ पे रहमत का साया ऐ इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा