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Un ko dekha to gaya bhool mein gham ki surat

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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उन को देखा तो गया भूल में ग़म की सूरत याद भी अब तो नहीं रंज ओ अलम की सूरत ख़्वाब में देखूं अगर दाफ़े-ग़म की सूरत फिर न वाक़्या हो कभी रंज ओ अलम की सूरत आबले पांव में पड़ जाएं जो चलते चलते राह-ए-तैबा में चलूं सर से क़दम की सूरत तुम अगर चाहो तो इक चीन ओ जबीं से अपनी करदो आदा को क़लम शाख़-ए-क़लम की सूरत नाम वाला तेरा ऐ काश मिसाल-ए-मजनूं रेग पर उंगलियों से लिखूं क़लम की सूरत तेरा दीदार करे रहम मुजस्सम तेरा देखनी हो जिसे रहमान के करम की सूरत आप हैं शान-ए-करम कान-ए-करम जान-ए-करम आप हैं फ़ज़्ल-ए-अतम लुत्फ़-ए-अअम की सूरत एक इशारा तेरे अब्रू का शह हर दूसरा काट दे दुश्मनों को तेग़-ए-दो-दम की सूरत आप का मिस्ल-ए-शह कैसे नज़र में आए किस ने देखी है भला अह्ल-ए-अदम की सूरत मोम है उन के क़दम के लिए दिल पत्थर का संग ने दिल में रखी उन के क़दम की सूरत ख़्वाब में भी न नज़र आए अगर तुम चाहो दर्द-ओ-ग़म, रंज-ओ-अलम, ज़ुल्म-ओ-सितम की सूरत ऐ सहाब-ए-करम एक बूंद करम की पड़ जाए सफ़हा-ए-दिल से मेरे मह्व हो ग़म की सूरत जब से सूखे हैं मेरे किश्त-ए-अमल बाग़-ए-अमल याद आती है मुझे अब्र-ए-करम की सूरत सफ़हा-ए-दिल पे मेरे नाम-ए-नबी कुन्दा हो नक़्श हो दिल पे मेरे उन के अलम की सूरत तेरी तस्वीर खिंचे रूह मुनव्वर क्यों कर कैसे खिंचे कोई मिस्बाह-ए-ज़ुल्म की सूरत आएं जो ख़्वाब में वो हो शब-ए-ग़म ईद का दिन जाएं तो ईद का दिन हो शब-ए-ग़म की सूरत जाएं गुलशन से तो लुट जाए बहार-ए-गुलशन दश्त में आएं तो हो दश्त-ए-इरम की सूरत भीड़ को ख़ौफ़ न हो शेर से जो तुम चाहो तुम जो चाहो तो बने शेर-ए-ग़नम की सूरत कोह हो जाएं अगर चाहो तो सोना चांदी संगरेज़े बनें दीनार-ओ-दिरहम की सूरत सूरत-ए-पाक वो बे-मिस्ल है पायी तुम ने जिस की सानी न अरब और न अजम की सूरत दम निकल जाए मेरा राह में उन की नूरी उन के कूचे में रहूं नक़्श-ए-क़दम की सूरत