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Wasf kya likhay koi us mahbat-e-anwar ka

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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वस्फ़ क्या लिखे कोई उस महबत-ए-अनवार का मेहर-ओ-मह में जलवा है जिस चाँद से रुख़सार का अर्श-ए-आज़म पर फिरिया है शह-ए-अबरार का बजता है कौनैन में डंका मेरे सरकार का दोजहाँ में बंटा है बाड़ा इसी सरकार का दोनों आलम पाते हैं सदक़ा इसी दरबार का जारी है आठों पहर लंगर सख़ी दरबार का फ़ैज़ पर हर दम है दरिया अहमद-ए-मुख़्तार का रौज़ा-ए-वाला-ए-तैयबा मख़ज़न-ए-अनवार है क्या कहूँ आलम में तुझ से जलवागाह-ए-यार का दिल है किस का जान किस की सब के मालिक हैं वही दोनों आलम पर है क़ब्ज़ा अहमद-ए-मुख़्तार का क्या करे सोने का कुश्ता कुश्ता तीर-ए-इश्क़ का दीद का प्यासा करे शरबत-ए-दीनार का फ़क़ हो चेहरा मेहर-ओ-मह का ऐसे मुँह के सामने जिस को क़िस्मत से मिले बोसा तेरी पज़ार का लात मारी तुम ने दुनिया पर अगर तुम चाहते सिलसिला सोने का होता सिलसिला-ए-गहसार का मैं तेरी रहमत के क़ुर्बां ऐ मेरे अमन-ओ-अमाँ कोई भी पुर्सान नहीं है मुझ से बदकिरदार का हैं मआसी हद से बाहर फिर भी ज़ाहिद ग़म नहीं रहमत-ए-आलम की उम्मत बंदा हूँ ग़फ़्फ़ार का तू है रहमत बाब-ए-रहमत तेरा दरवाज़ा हुआ साया-ए-फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा साया-ए-तेरी दीवार का कअबा-ओ-अक़्सा-ओ-अर्श-ओ-ख़ुल्द हैं नूरी मगर है निराला सब से आलम जलवागाह-ए-यार का