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Wasl-e-Awwal Fazail-e-Sarkar-e-Ghausiyat

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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तेरा ज़र्रा मह-ए-कामिल है या गौस तेरा क़तरा यम-ए-साईल है या गौस कोई सालिक है या वासिल है या गौस वह कुछ भी हो तेरा साईल है या गौस क़द-ए-बे-साया ज़िल्ल-ए-किब्रिया है तू उस बे-साया ज़िल्ल का ज़िल्ल है या गौस तेरी जागीर में है शर्क़ ता गर्व क़लम-रौ में हरम ता हल है या गौस दिल-ए-इश्क ओ रुख़-ए-हुस्न आईना हैं और उन दोनों में तेरा ज़िल्ल है या गौस तेरी शम-ए-दिल आरा की तब ओ ताब गुल ओ बुलबुल की आब ओ गिल है या गौस तेरा मजनूं तेरा सहरा तेरा नज्द तेरी लैला तेरा महमल है या गौस यह तेरी चम्पी रंगत हुसैनी हुस्न के चांद सुब्ह-ए-दिल है या गौस गुलिस्तां ज़ार तेरी पंखड़ी है कली सौ खुल्द का हासिल है या ग़ौस उगाल इसका उधार-ए-अबरार का हो जिसे तेरा उल्थ हासिल है या ग़ौस इशारा में किया जिसने क़मर चाक तो उस मुँह का मह-ए-कामिल है या ग़ौस जिसे अर्श-ए-दोम कहते हैं अफ़लाक वो तेरी कुर्सी-ए-मंज़िल है या ग़ौस तू अपने वक़्त का सिद्दीक़-ए-अकबर ग़नी ओ हैदर ओ आदिल है या ग़ौस वली क्या मुरसल आएँ ख़ुद हुज़ूर आएँ वो तेरी वअज़ की महफ़िल है या ग़ौस जिसे माँगे न पाएँ जाह वाले वो बिन माँगे तुझे हासिल है या ग़ौस फ़यूज़-ए-आलम-ए-उम्मी से तुझ पर अयां माज़ी ओ मुस्तक़बिल है या ग़ौस जो क़रनों सैर में आरिफ़ न पाएँ वो तेरी पहली ही मंज़िल है या ग़ौस मल्क मश्गूल हैं उसकी सना में जो तेरा ज़ाकिर ओ शागिल है या ग़ौस न क्यों हो तेरी मंज़िल अर्श-ए-सानी कि अर्श-ए-हक़ तेरी मंज़िल है या ग़ौस वहीं से उबले हैं सातों समंदर जो तेरी नहर का साहिल है या ग़ौस मलाइिक के बशर के जिन के हलक़े तेरी ज़ौ-ए-माह-ए-हर मंज़िल है या ग़ौस बुख़ारा ओ इराक़ ओ चिश्त ओ अजमेर तेरी लौ शम-ए-हर महफ़िल है या ग़ौस जो तेरा नाम ले ज़ाकिर है प्यारे तसव्वुर जो करे शागिल है या ग़ौस जो सर दे कर तेरा सौदा ख़रीदे ख़ुदा दे अक़्ल वो आक़िल है या ग़ौस कहा तू ने कि जो माँगो मिलेगा रज़ा तुझ से तेरा साइल है या ग़ौस