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Wasl-e-Dom Faza'il-e-Ghous-e-Madadgaar

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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जो तेरा तिफ्ल है कामिल है या ग़ौस तुफ़ैल का लक़ब वासिल है या ग़ौस तसव्वुफ़ तेरे मकतब का सबक़ है तसर्रुफ़ पर तेरा आमिल है या ग़ौस तेरी सैर इललल्लाह ही है फ़िल्लह कि घर से चलते ही मूसिल है या ग़ौस तू नूर-ए-अव्वल ओ आख़िर है मौला तू ख़ैर-ए-आजिल ओ आजिल है या ग़ौस मल्क के कुछ बशर कुछ जिन के हैं पीर तू शैख़-ए-आली ओ साफ़िल है या ग़ौस किताब-ए-हर दिल-ए-आसार-ए-तअर्रुफ़ तेरे दफ़्तर ही से नाक़िल है या ग़ौस फुतूह-उल-गैब अगर रौशन न फरमाये फुतूहात-ओ-फुसूस आफ़िल है या गौस तेरा मंसूब है मरफूअ इस जा इज़ाफ़त रफ़अ की आमिल है या गौस तेरे कामी मशक्क़त से बरी हैं के बरतर नसब से फ़ाएल है या गौस अहद से अहमद और अहमद से तुझ को गुन और सब गुन मगन हासिल है या गौस तेरी इज़्ज़त तेरी रिफ़अत तेरा फ़ज़्ल बफ़ज़लिही अफ़ज़ल-ओ-फ़ाज़िल है या गौस तेरे जलवे के आगे मन्तिक़ा से मह-ओ-खोर पर ख़त-ए-बातिल है या गौस सियाही माइल उसकी चांदनी आई क़मर का यूँ फ़लक माइल है या गौस तलाये-मेहर है ठकसां बाहर के ख़ारिज मरकज़-ए-हामिल है या गौस तू बरज़ख है बरंग-ए-नून-ए-मिअत दो जानिब मुत्तसिल वासिल है या गौस नबी से अख्ज़ और उम्मत पे फ़ाइज़ उधर क़ाबिल इधर फ़ाएल है या गौस नतीजा हद्द-ए-औसत गर के दे और यहाँ जब तक न तू शामिल है या गौस अला तूबा लकुम है वोह के जिन का शबाना रोज़ विर्द-ए-दिल है या गौस अजम क्या अरब क्या जल क्या हरम में जमी हर जा तेरी महफ़िल है या गौस है शरह-ए-इस्म-उल-क़ादिर तेरा नाम ये शरह उस मतन की हामिल है या गौस जबीं जुब्बा-फ़रसाई का संदल तेरी दीवार की गेहगल है या गौस बजा लाया वोह अम्र-ए-सारेऊ को तेरी जानिब जो मुस्तअजिल है या गौस तेरी क़ुदरत तो मिरयात से है के क़ादिर नाम में दाखिल है या गौस तसर्रुफ़ वाले सब मज़हर हैं तेरे तू ही इस परदे में फ़ाएल है या गौस रज़ा के काम और रुक जायें हाशा तेरा साइल है तो बाज़िल है या गौस