Home/Imam Ahmad Raza Khan Qadri/Wohi Rabb Hai Jis Ne Tujh Ko Hama Tan Karam Banaya

वही रब है जिस ने तुझ को हम-तन करम बनाया

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

100%
वही रब है जिस ने तुझ को हम-तन करम बनाया हमें भीक मांगने को तेरा आस्तां बताया तुझे हम्द है ख़ुदाया तुम्हें हाकिम बराया तुम्हें क़ासिम अताया तुम्हें दाफे बलाया तुम्हें शाफे ख़ताया कोई तुम सा कौन आया वो कंवारी पाक मरयम वो नफ़ख़्तु फ़ीहि का दम है अजब निशान-ए-आज़म मगर आमना का जाया वही सब से अफ़ज़ल आया यही बोले सिदरा वाले चमन जहां के थाले सभी मैं ने छान डाले तेरे पाया का न पाया तुझे यक ने यक बनाया फ़ा-इज़ा फ़रग़ता फ़नस़ब यह मिला है तुम को मन्स़ब जो गदा बना चुके अब उठो वक़्त-ए-बख़्शिश आया करो क़िस्मत अताया व-इला रब्बिका फ़रग़ब करो अर्ज़ सब के मतलब कि तुम्हें को तकते हैं सब करो उन पर अपना साया बनो शाफे ख़ताया अरे ऐ ख़ुदा के बंदो! कोई मेरे दिल को ढूँढो मेरे पास था अभी तो अभी क्या हुआ ख़ुदाया न कोई गया न आया हमें ऐ रज़ा तेरे दिल का पता चला ब-मुश्किल दैर-ए-रौज़ा के मुक़ाबिल वो हमें नज़र तो आया यह न पूछ कैसा पाया कभी ख़ंदा ज़ेर-ए-लब है कभी गिरिया सारी शब है कभी ग़म कभी तरब है न सबब समझ में आया न उस ने कुछ बताया कभी ख़ाक पर पड़ा है सर-ए-चर्ख़ ज़ेर-ए-पा है कभी पेश-ए-दर खड़ा है सर-ए-बंदगी झुकाया तू क़दम में अर्श पाया कभी वो टपक कि आतिश कभी वो टपक कि बारिश कभी वो हुजूम-ए-नालिश कोई जाने अबर छाया बड़ी जोशिशों से आया कभी वो चहक कि बुलबुल कभी वो महक कि ख़ुद गुल कभी वो लहक कि बिल्कुल चमन-ए-जिनां खिलाया गुल-ए-क़ुदस लहलाया कभी ज़िंदगी के अरमां कभी मर्ग-ए-नौ का ख़्वाहां वो जिया कि मर्ग क़ुर्बां वो मुवा कि ज़ीस्त लाया कहे रूह हां जलाया कभी गुम कभी अयां है कभी सर्द कि तपां है कभी ज़ेर-ए-लब फ़ग़ां है कभी चुप कि दम न थाया रुख़-ए-काम जां दिखाया ये तसव्वुरात-ए-बातिल तेरे आगे क्या हैं मुश्किल तेरी कुदरतें हैं कामिल उन्हें राईट कर ख़ुदाया मैं उन्हें शाफ़ी लाया