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या रसूल अल्लाह! मुजरिम हाज़िर-ए-दरबार है

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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या रसूल अल्लाह! मुजरिम हाज़िर-ए-दरबार है नेकियाँ पल्ले नहीं सर पुर-गुनाह का बार है नामा-ए-आमाल में कोई नहीं हुस्न-ए-अमल पास दौलत नेकियों की कुछ नहीं नादार है तुम शह-ए-अबरार ये सब से बड़ा असियाँ शआर यूँ शफ़ाअत का ही सब से बड़ा हक़दार है करदो माला माल आक़ा दौलत-ए-अख़लाक़ से ख़ुल्क़ की दौलत से ये महरूम-ओ-बदगुफ़्तार है इस की आँखें पाक कर के जलवा-ए-ज़ेबा दिखा एक मुद्दत से ये तेरा तालिब-ए-दीदार है गुम्बद-ए-ख़ज़रा पे आक़ा जाँ मेरी क़ुर्बान हो मेरी दरीना यही हसरत शह-ए-अबरार है मुस्कुराते आओ आक़ा आ के कलमा भी पढ़ाओ हो करम शाह-ए-मदीना! जाँ-ए-लब बीमार है आफ़तों ने घेर रखा है शहा हर सम्त से मुलतजी चश्म-ए-करम का बेकस-ओ-नाचार है जो तेरे दर पे झुका वो सर-बुलंदी पा गया जो अकड़ कर रह गया बे-शक ज़लील-ओ-ख़ुवार है दुश्मनों के ज़ुल्म से भी तजावुज़ कर गए आप से फ़रियाद मौला हैदर-ए-कर्रार है क़ल्ब-ए-मुज़्तर चश्म-ए-तर सोज़-ए-जिगर सीना तपाँ तालिब-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ जाँ-बजाँ अत्तार है सब गुनाहगार एक तरफ़ अत्तार अकेला एक तरफ़ मुजरिमों में मुंतख़ब मुजरिम यही अत्तार है