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ज़ाइर-ओ-पास-ए-अदब रखो हवस जाने दो

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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ज़ाइर-ओ-पास-ए-अदब रखो हवस जाने दो आँखें अंधी हुई हैं उन को तरस जाने दो सूख जाती है उम्मीद-ए-गुरबा की खेती बूँदियाँ लक-ए-रहमत की बरस जाने दो पलटी आती है अभी वज्द में जान-ए-शीरीं नग़मा-ए-ग़म का ज़रा कानों में रस जाने दो हम भी चलते हैं ज़रा काफ़िले वालो! ठहरो गठड़ियाँ तोशा-ए-उम्मीद की गस जाने दो दीद-ए-गुल और भी करती है क़यामत दिल पर हमसफ़ीर-ओ-हमें फिर सू-ए-क़फ़स जाने दो आतिश-ए-दिल भी तो भड़काओ अदब दां नालो कौन कहता है कि तुम ज़ब्त-ए-नफ़्स जाने दो यूँ तन-ए-ज़ार के दरپے हुए दिल के शोला शेवा-ए-खाना बर-अंदाज़ी-ए-ख़स जाने दो ऐ रज़ा आह कि यूँ सहल कटें जुर्म के साल दो घड़ी की भी इबादत तो बरस जाने दो