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Aah pura mere dil ka kabhi arman hoga

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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आह पूरा मेरे दिल का कभी अरमान होगा कभी दिल जलवा-गह-ए-सरवर-ए-ख़ूबान होगा मेरे दिल पर जो कभी जलवा-ए-जानाँ होगा लमआ-ए-नूर मेरे रुख़ से नुमायाँ होगा जलवा-ए-मुसहफ़-ए-रुख़ दिल में जो पिन्हाँ होगा पारे पारे में मेरे क़ल्ब के क़ुरआँ होगा चौंध जाए गी तेरी आँख भी महर-ए-महशर उन के ज़र्रा को जो देखे गा परेशाँ होगा देख मत देख मुझे गर्म नज़र से ख़ावर शोख़ी-ए-चश्म से तो आप परेशाँ होगा हुस्न वो पाया है ख़ुर्शीद-ए-रिसालत तू ने तेरे दीदार का तालिब मह-ए-कनआँ होगा जल्वा-ए-हुस्न-ए-जहाँ ताब का क्या हाल कहूँ आईना भी तुम्हें देख के हैरां होगा कौन पूछेगा भला रोज़-ए-जज़ा वो भी मुझे उन की रहमत के सिवा कोई पुर्सां होगा चाक-ए-तक़दीर को क्या सोज़न-ए-तदबीर से लाख वो बखिया करे चाक-ए-गरेबां होगा मुझ को दावा नहीं इस्मत का मगर बे-मौक़ा ऐब जोई न करेगा जो सुखन-दां होगा दिल-ए-दुश्मन के लिए तेग़-ए-दो पैकर है सुखन चश्म-ए-हासद को मेरा शेर नमक-दां होगा उम्र सारी तो कटी आहू में अपनी नूरी कब मदीने की तरफ कूच का सामां होगा