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Aaj hai jashn-e-wilaadat Marhaba Ya Mustafa

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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आज है जश्न-ए-विलादत मरहबा या मुस्तफा आज आए जान-ए-रहमत मरहबा या मुस्तफा मरहबा मेहर-ए-रिसालत मरहबा या मुस्तफा मरहबा माह-ए-नुबुव्वत मरहबा या मुस्तफा आमद-ए-शाह-ए-मदीना मरहबा सद मरहबा मरहबा ऐ जान-ए-रहमत मरहबा या मुस्तफा मरहबा आक़ा की आमद मरहबा नूर-ए-खुदा हो गई काफ़ूर ज़ुल्मत मरहबा या मुस्तफा आज दुनिया में विलादत-ए-मुस्तफ़ा की हो गई खूब चमकी अपनी क़िस्मत मरहबा या मुस्तफा कअबा सजदे को झुका बुत सारे औंधे गिर पड़े आ गई शैतान की शामत मरहबा या मुस्तफा आ गए सरकार हर सू बारिश-ए-अनवार है झूमते हैं अब्र-ए-रहमत मरहबा या मुस्तफा चार सू हैं रहमतों की क्या छमा छम बारिशें! आ गए लम्हात-ए-मुसर्रत मरहबा या मुस्तफा मरहबा की धूम डालो सब पुकारो मरहबा झूम कर अहल-ए-मोहब्बत मरहबा या मुस्तफा आज घर घर रोशनी है सब्ज़ परचम हैं बुलंद झूमते हैं अहल-ए-सुन्नत मरहबा या मुस्तफा ईद-ए-मीलादुन-नबी तो ईद की भी ईद है शादमां है खुद मुसर्रत मरहबा या मुस्तफा जश्न-ए-मीलादुन-नबी की धूम है चारों तरफ मस्त हैं अहल-ए-मोहब्बत मरहबा या मुस्तफा खूब गाती थीं तराने दफ़ बजा कर बच्चियां हर तरफ कहती थी ख़िलक़त मरहबा या मुस्तफा आ गई उठो सवारी आमना के लाल की उन से मांगो उनकी उल्फ़त मरहबा या मुस्तफा ले के कश्कोल ऐ फकीरो आमना के घर चलो मांग लो जो चाहो नेमत मरहबा या मुस्तफा या नबी! अपनी विलादत की खुशी में दीजिये खुल्द में अपनी रफ़ाक़त मरहबा या मुस्तफा वास्ता तुम को विलादत का मदीने में जगह मुझ को दे दो बहर-ए-तर्बत मरहबा या मुस्तफा दे दो तुम अत्तार को ईदी में चश्म-ए-अश्कबार अपना ग़म दो अपनी उल्फ़त मरहबा या मुस्तफा