ऐ दिल तू दुरूदों की अव्वल तू सजा डाली
फिर जा के मदीना में रौज़े पे चढ़ा डाली
क्या नज़्र करूँ तेरे दरबार-ए-मुक़द्दस में
तौसीफ़ के फूलों की लाया हूँ शहा डाली
अहमद को क्या आक़ा और हम को क्या बंदा
अल्लाह ने रहमत की क्या ख़ूब बना डाली
बस जाए दिमाग़-ए-जाँ उश्शाक़ का ख़ुशबू से
ला बाग़-ए-मदीना से फूलों की सबा डाली
ख़ुर्शीद ओ क़मर ऐसे होते न कभी रौशन
तू ने ही झलक उन में ऐ नूर-ए-ख़ुदा डाली
तुम से न कहूँ क्यों कर तुम चाँद अरब के हो
देखो तो शब-ए-ग़म ने क्या मुझ पे बला डाली
शर्मिंदा किया मुझ को आगे मेरे आक़ा के
ऐ नफ़्स-ए-लईं तू ने मुझ पर ये बला डाली