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ऐ दिल तू दुरूदों की अव्वल तू सजा डाली

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ऐ दिल तू दुरूदों की अव्वल तू सजा डाली फिर जा के मदीना में रौज़े पे चढ़ा डाली क्या नज़्र करूँ तेरे दरबार-ए-मुक़द्दस में तौसीफ़ के फूलों की लाया हूँ शहा डाली अहमद को क्या आक़ा और हम को क्या बंदा अल्लाह ने रहमत की क्या ख़ूब बना डाली बस जाए दिमाग़-ए-जाँ उश्शाक़ का ख़ुशबू से ला बाग़-ए-मदीना से फूलों की सबा डाली ख़ुर्शीद ओ क़मर ऐसे होते न कभी रौशन तू ने ही झलक उन में ऐ नूर-ए-ख़ुदा डाली तुम से न कहूँ क्यों कर तुम चाँद अरब के हो देखो तो शब-ए-ग़म ने क्या मुझ पे बला डाली शर्मिंदा किया मुझ को आगे मेरे आक़ा के ऐ नफ़्स-ए-लईं तू ने मुझ पर ये बला डाली