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ऐ ग़ुलाम-ए-चहार यार ओ बा-सफ़ा ग़ौस-ए-पाक

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ऐ ग़ुलाम-ए-चहार यार ओ बा-सफ़ा ग़ौस-ए-पाक है हिमायत पर तरी अशरत-ए-रसूल-अल्लाह की रास्ता पूछो नजूम-ए-मुस्तफ़ा से गुम रहो और सफ़ीना नूह का अशरत-ए-रसूल-अल्लाह की हैं इसी हालत से ज़िंदा जिस तरह दुनिया में थे ज़ाहिरी सूरत से थी रह्लत-ए-रसूल-अल्लाह की आरज़ूएँ दिल की करती हैं दुआ अल्लाह से हम भी देखेंगे कभी तुर्बत-ए-रसूल-अल्लाह की आते हैं लाखों मलक जिस की ज़ियारत को उन्हें जान-ए-मोमिन कहिए या तुर्बत-ए-रसूल-अल्लाह की पेश-ए-मिम्बर ख़ारिज-ए-मस्जिद अज़ान-ए-ख़ुत्बा हो है मुसलमानों यही सुन्नत-ए-रसूल-अल्लाह की देख लो ऐ नज्दियो वक़्त-ए-रसूल-अल्लाह की अर्श-ए-आज़म पर हुई दावत-ए-रसूल-अल्लाह की