ऐ ग़ुलाम-ए-चहार यार ओ बा-सफ़ा ग़ौस-ए-पाक
है हिमायत पर तरी अशरत-ए-रसूल-अल्लाह की
रास्ता पूछो नजूम-ए-मुस्तफ़ा से गुम रहो
और सफ़ीना नूह का अशरत-ए-रसूल-अल्लाह की
हैं इसी हालत से ज़िंदा जिस तरह दुनिया में थे
ज़ाहिरी सूरत से थी रह्लत-ए-रसूल-अल्लाह की
आरज़ूएँ दिल की करती हैं दुआ अल्लाह से
हम भी देखेंगे कभी तुर्बत-ए-रसूल-अल्लाह की
आते हैं लाखों मलक जिस की ज़ियारत को उन्हें
जान-ए-मोमिन कहिए या तुर्बत-ए-रसूल-अल्लाह की
पेश-ए-मिम्बर ख़ारिज-ए-मस्जिद अज़ान-ए-ख़ुत्बा हो
है मुसलमानों यही सुन्नत-ए-रसूल-अल्लाह की
देख लो ऐ नज्दियो वक़्त-ए-रसूल-अल्लाह की
अर्श-ए-आज़म पर हुई दावत-ए-रसूल-अल्लाह की