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ऐ काश फिर मदीने में अत्तार जा सके

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ऐ काश! फिर मदीने में अत्तार जा सके, रो रो के हाल-ए-शाह को अपना सुना सके पिछले बरस तो हाज़िर-ए-दर हो गया था आह! इस साल काश हज का शरफ़ फिर से पा सके या रब-ए-मुस्तफा! कोई ऐसा सबब बना, साए में मौत गुम्बद-ए-खज़रा के आ सके तैयबा बुला, या वो दिल-ए-ग़मगीं दे मुझे, दिल से ना तेरा ग़म कोई मेरे मिटा सके या रब! मुझे वो आँख दे कि जो इश्क़-ए-रसूल-ए-पाक में आँसू बहा सके वो आग मेरे सीने में आक़ा लगाए, पत्थर से सख़्त क़ल्ब को भी जो जला सके सरकार-ए-चार यार हों वास्ता, ऐसी बहार दो ना ख़िज़ां पास आ सके दुश्मन अगरचे घात में है कोई ग़म नहीं, उन की मदद रहे तो बिगाड़ अपना क्या सके चश्म-ए-करम हो ऐसी कि मिट जाए हर ख़ता, कोई गुनाह मुझ से ना शैतान करा सके है सब्र तो ख़ज़ाना फ़िरदौस भाइयो! आशिक़ के लब पे शिकवा कभी भी ना आ सके जिस वक़्त सुन्नतों का मैं करने लगूं बयां, ऐसा असर हो पैदा जो दिल को हिला सके मेरी ज़बान में वो असर दे ख़ुदा-ए-पाक, जो मुस्तफा के इश्क़ में सब को रुला सके अत्तार तेरे हामी-ओ-नासिर हैं मुस्तफा, किस की मजाल है कि जो तुझ को दबा सके