ऐ ख़ाक-ए-मदीना! तेरा कहना क्या है
तुझे कुर्ब-ए-शाह-ए-मदीना मिला है
शरफ़-ए-मुस्तफ़ा के क़दम चूमने का
तुझे बारहा ख़ाक-ए-तैबा मिला है
मुअत्तर है कितनी तू ख़ाक-ए-मदीना
कि खुशबुओं से ज़र्रा ज़र्रा बसा है
लगाओ तुम आँखों में ख़ाक-ए-मदीना
कोई इस से बेहतर भी सुरमा भला है
मरीज़ों! उठा कर के ख़ाक-ए-मदीना
मले जाओ! इस में यक़ीनन शफ़ा है
मदीने की मिट्टी ज़रा सा उठा कर
पियो घोल कर हर मर्ज़ की दवा है
अक़ीदत से ख़ाक-ए-मदीना बदन पर
मलो तुम हर एक दर्द की यह दवा है
तुझे वास्ता तैबा का या रब!
अता कर ग़म-ए-मुस्तफ़ा इल्तिजा है
हमें मौत ख़ाक-ए-मदीना पे आए
इलाही! यह तुझ से हमारी दुआ है
मरी नअश पर आप ख़ाक-ए-मदीना
छिड़कना मेरे साथियो! इल्तिजा है
पस-ए-मर्ग मौला! तू मिट्टी हमारी
मिला ख़ाक-ए-तैबा में यह इल्तिजा है
बदन पर है अत्तार के ख़ाक-ए-तैबा
परे हट जहन्नम! तेरा काम क्या है