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ऐ ख़ाक-ए-मदीना तेरा कहना क्या है

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ऐ ख़ाक-ए-मदीना! तेरा कहना क्या है तुझे कुर्ब-ए-शाह-ए-मदीना मिला है शरफ़-ए-मुस्तफ़ा के क़दम चूमने का तुझे बारहा ख़ाक-ए-तैबा मिला है मुअत्तर है कितनी तू ख़ाक-ए-मदीना कि खुशबुओं से ज़र्रा ज़र्रा बसा है लगाओ तुम आँखों में ख़ाक-ए-मदीना कोई इस से बेहतर भी सुरमा भला है मरीज़ों! उठा कर के ख़ाक-ए-मदीना मले जाओ! इस में यक़ीनन शफ़ा है मदीने की मिट्टी ज़रा सा उठा कर पियो घोल कर हर मर्ज़ की दवा है अक़ीदत से ख़ाक-ए-मदीना बदन पर मलो तुम हर एक दर्द की यह दवा है तुझे वास्ता तैबा का या रब! अता कर ग़म-ए-मुस्तफ़ा इल्तिजा है हमें मौत ख़ाक-ए-मदीना पे आए इलाही! यह तुझ से हमारी दुआ है मरी नअश पर आप ख़ाक-ए-मदीना छिड़कना मेरे साथियो! इल्तिजा है पस-ए-मर्ग मौला! तू मिट्टी हमारी मिला ख़ाक-ए-तैबा में यह इल्तिजा है बदन पर है अत्तार के ख़ाक-ए-तैबा परे हट जहन्नम! तेरा काम क्या है