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Afsos Waqt-e-Rukhsat Nazdeek Aa Raha Hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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अफ़सोस वक़्त-ए-रुख़सत नज़दीक आ रहा है इक हूक उठ रही है दिल बैठा जा रहा है दिल में ख़ुशी थी कैसी जब मैं चला था घर से दिल ग़म के गहरे दरिया में डूबा जा रहा है है फ़ुरक़त-ए-मदीना से चाक चाक सीना अब्र-ए-सियाह-ए-ग़म का अब दिल पे छा रहा है आंख अश्कबार है अब दिल बे-क़रार है अब दिल को जुदाई का ग़म अब ख़ूं रुला रहा है क्यों सब्ज़ सब्ज़ गुम्बद पर हो गया ना क़ुर्बान ऐ ज़ाइर-ए-मदीना! तू भूल खा रहा है अफ़सोस! चंद घड़ियां तैयबा की रह गई हैं दिल में जुदाई का ग़म तूफ़ान मचा रहा है कुछ भी ना कर सका हूं हाये अदब यहां का ये ग़म मरे कलेजे को काट खा रहा है अब रूह भी है मग़मूम और जान भी है हैरां बादल ग़म-ओ-अलम का हर सिम्त छा रहा है मौत आप की गली की बेहतर है ज़िंदगी से हाये मुक़द्दर इन का दर क्यों छुड़ा रहा है अफ़सोस चल दिया है अब क़ाफ़िला हमारा हर एक ग़म का मारा आँसू बहा रहा है दिल ख़ूं रो रहा है आँसू छलक रहे हैं मेरी नज़र से तैयबा अब छुपता जा रहा है आह! अल-फ़िराक़ आक़ा! आह! अल-विदा मौला अब छोड़ कर मदीना अत्तार जा रहा है