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Aisa lagta hai Madine jald woh bulwayenge

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ऐसा लगता है मदीने जल्द वो भुलवाएंगे जाएंगे जा कर उन्हें ज़ख्म दिखलाएंगे वो अगर चाहेंगे तो ऐसी नज़र फ़रमाएंगे खूब रोएंगे बिछाड़ों पर बिछाड़ें खाएंगे खुश्क अश्क-ए-आंखें हैं दिल भी सख्त है आप ही चाहेंगे तो आक़ा हमें तड़पाएंगे मौत अब तो गुम्बद-ए-ख़ज़रा के साये में मिले कब तक आक़ा दर-बदर की ठोकरें हम खाएंगे ऐ खुशा! तक़दीर से गर हम को मंज़ूरी मिली रख के सर दहलीज़ पर सरकार की मर जाएंगे रोते रोते गिर पड़ेंगे उन के क़दमों में वहां रोज़-ए-महशर शफी-ए-महशर नज़र जब आएंगे खुल्द में होगा हमारा दाखिला उस शान से या रसूल अल्लाह का नारा लगाते जाएंगे हश्र में कैसे संभालूंगा मैं अपने आप को आमिर-ए-अत्तार! आ वो जब वहां फरमाएंगे हाए अब की बार भी अत्तार जो ज़िंदा बचे फिर मदीने से कराची रोते रोते आएंगे