अल्लाह अल्लाह तेरा दरबार-ए-रसूल-ए-अरबी
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
अल्लाह अल्लाह तेरा दरबार रसूल-ए-अरबी, तेरा दरबार-ए-करम बार रसूल-ए-अरबी।
बे-कसों के हो मददगार रसूल-ए-अरबी, ग़मज़दों के भी हो ग़मख़्वार रसूल-ए-अरबी।
गुले खुदाई के हो मुख़्तार रसूल-ए-अरबी, तुम रसूलों के भी सरदार रसूल-ए-अरबी।
इक नज़र या शहे अबरार रसूल-ए-अरबी, बस तेरा ही रहूँ बीमार रसूल-ए-अरबी।
फिर दिखा दो मुझे एक बार रसूल-ए-अरबी, तुम मदीने का वो गुलज़ार रसूल-ए-अरबी।
सामने हों तेरे मीनार रसूल-ए-अरबी, गुम्बदे सब्ज़ के अनवार रसूल-ए-अरबी।
तेरा सहरा, तेरा कहसार रसूल-ए-अरबी, और हो ये बदकार रसूल-ए-अरबी।
तेरी दीवार को चूमूँ तेरा दरवाज़ा भी, धूल भी फूल भी और ख़ार रसूल-ए-अरबी।
बूँ ही रोता हुआ आऊँ मैं तेरे रौज़े पर, काश! उसी आन हो दीदार रसूल-ए-अरबी।
कोई ख़ाली नहीं लौटा कभी दर से आका, है सखी आप का दरबार रसूल-ए-अरबी।
कोई दौलत, कोई सरवत, कोई शोहरत चाहे, मैं फ़क़त तेरा तलबगार रसूल-ए-अरबी।
आतिशे इश्क़ भड़कती ही रहे सीने में, बस तड़पता रहूँ सरकार! रसूल-ए-अरबी।
आप के हिज्र का ग़म काश रुलाए मुझ को, ख़ून रोता रहूँ सरकार! रसूल-ए-अरबी।
हो मदीने ही मदीना मेरे लब पर ऐ काश, हर घड़ी हो यही तकरार रसूल-ए-अरबी।
मुझ को दीवाना बना लो शहे वाला अपना, मेरे सरवर मेरे सरदार रसूल-ए-अरबी।
तेरे दरबारे गौहर बार के सब साइल हैं, अ़ग़निया भी हों नादार रसूल-ए-अरबी।
तेरे दीवाने तड़पते हैं मदीने के लिए, वो भी देखें तेरा दरबार रसूल-ए-अरबी।
दूरे सुन्नत से मुसलमाँ हुए जाते हैं, आह! फ़ैशन की है यलार रसूल-ए-अरबी।
सुन्नतों का हो अता दर्द मुसलमानों को, दूर फ़ैशन की हो भरमार रसूल-ए-अरबी।
मेरा सीना तेरी सुन्नत का मदीना बन जाए, सुन्नतों का करूँ परचार रसूल-ए-अरबी।
जामे दीदार पिला दो मेरे आका! अब तो, आँख है कब से तलबगार रसूल-ए-अरबी।
मुश्किलें मेरी हों आसान बराए मुर्शिद, मेरे हामी, मेरे ग़मख़्वार रसूल-ए-अरबी।
वास्ता गौस-ओ-रज़ा का सरे बालीं आजा, जाँ बलब है तेरा बीमार रसूल-ए-अरबी।
मुस्कुराते हुए उश्शाक़ चले दुनिया से, क़ब्र में होगा जो दीदार रसूल-ए-अरबी।
हुबे दुनिया में गिरफ़्तार है नफ़्से ज़ालिम, अल-मदद या शहे अबरार! रसूल-ए-अरबी।
दिल पे शैतान ने आ कर जमाया क़ब्ज़ा, हूँ गुनाहों में गिरफ़्तार रसूल-ए-अरबी।
आह! बढ़ता ही चला जाता है मर्ज़े असियाँ, दो शफ़ा सय्यदे अबरार! रसूल-ए-अरबी।
मैं गुनहगार, सिपहकार-ओ-ख़ताकार सही, पर हूँ किस का? तेरा सरकार! रसूल-ए-अरबी।
मेरी हर ख़सलते बद दूर हो जाने आलम! नेक बन जाऊँ मैं सरकार! रसूल-ए-अरबी।
गर्मी-ए-हश्र से बे-ताब हूँ शाहे कौसर, हो नज़र सूए गुनहगार रसूल-ए-अरबी।
अब तो सरकार! हो अत्तार पे नज़रे रहमत, कह दो अपना सगे दरबार रसूल-ए-अरबी।