अल्लाह अता हो मुझे दीदारे मदीना
हो जाऊं मैं फिर हाज़िरे दरबारे मदीना
आंखें मेरी महरूम हैं मुद्दत से इलाही
अरसा हुआ देखा नहीं गुलज़ारे मदीना
फिर देख लूं सहराए मदीना की बहारें
फिर पेशे नज़र काश! हों गहसारे मदीना
फिर गुंबदे ख़ज़रा के नज़ारे हों मयस्सर
अल्लाह दिखा दे मुझे अनवारे मदीना
ख़ाक आंखों में महबूब के कूचे की सजा कर
देने को सलामी चलूं दरबारे मदीना
क्या कैफ़ो सुरूर आता था अफ़सोस वो मेरे
थे ख़्वाब वो गोया सभी अस्फ़ारे मदीना
तअज़ीम को उठ जाते सभी क़ाफ़िले वाले
जूं ही नज़र आते उन्हें आ सारे मदीना
पढ़ पढ़ के सुनाया है उन्हें कलमाए तय्यब
ईमां पे हैं शाहिद मेरे अशजारे मदीना
शादाबीए जन्नत का मैं मुनकिर नहीं लेकिन
है हुस्न में बे मिसल चमन ज़ारे मदीना
अफ़सोस! मेरे नफ़्स को फूलों की तलब है
आ दिल में समा जा मेरे ए ख़ारे मदीना
कसरत से दुरूदे उन पे पढ़ूं रब ने जो चाहा
सीने में उतर आएंगी अनवारे मदीना
सरकार बुलाते हैं मदीने में करम से
उस को कि जो हो दिल से तलबगारे मदीना
रिहलत की घड़ी है मेरे अल्लाह दिखा दे
शरफ़ एक झलक जलवाए सरकारे मदीना
अल्लाह मुझे बख़्श, न हो हश्र में पुर्सिश
कर लुत्फ़ो करम अज़ पये सरकारे मदीना
या रब दिले अत्तार पे छाई है उदासी
कर शाद दिखा कर उसे गुलज़ारे मदीना