अमल का हो जज़्बा अता या इलाही! गुनाहों से मुझ को बचा या इलाही!
मैं पाँचों नमाज़ें पढ़ूँ बा-जमाअत, हो तौफ़ीक़ ऐसी अता या इलाही!
मैं पढ़ता रहूँ सुन्नतें, वक़्त ही पर, हों सारे नवाफ़िल अदा या इलाही!
दे शौक़-ए-तिलावत दे ज़ौक़-ए-इबादत, रहूँ बा-वुज़ू में सदा या इलाही!
हमेशा निगाहों को अपनी झुका कर, करूँ ख़ाशिआना दुआ या इलाही!
ना नेकी की दावत में सुस्ती हो मुझ से
बना शाईक-ए-काफ़िला या इलाही
सआदत मिले दर्स-ए-फैज़ान-ए-सुन्नत
की रोज़ाना दो मर्तबा या इलाही
मैं मिट्टी के सादा से बर्तन में खाऊं
चटाई का हो बिस्तर या इलाही
है आलम की खिदमत यक़ीना सआदत
हो तौफ़ीक़ उस की अता या इलाही
सदा-ए-मदीना दूं रोज़ाना सदक़ा
अबू बक्र ओ फ़ारूक़ का या इलाही
मैं नीची निगाहें रखूं काश अक्सर
अता कर दे शर्म ओ हया या इलाही
हमेशा करूं काश पर्दे में पर्दा
तू पैकर-ए-हया का बना या इलाही
लिबास-ए-अपना सुन्नत से आरास्ता हो
अमामा हो सर पर सजा या इलाही
सभी रुख़ पे एक मुश्त दाढ़ी सजाएं
बनें आशिक़-ए-मुस्तफ़ा या इलाही
हर एक मदनी इनाम ऐ काश! पाऊं
करम कर पये मुस्तफ़ा या इलाही
हो अख़लाक़ अच्छा हो किरदार सुथरा
मुझे मुत्तक़ी तू बना या इलाही
ग़सीले मिज़ाज और तमसख़ुर की ख़सलत
से अत्तार को तू बचा या इलाही