हमारे आक़ा हमारे मौला इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
हमारे मलजा हमारे मावा इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
ज़माना भर ने ज़माना भर में बहुत तजस्सुस किया लेकिन
मिला ना कोई इमाम सा इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
सिपहर-ए-इल्म-ओ-अमल के सूरज तुम ही हो सब हैं तुम्हारे तारे
तुम ही से चमका है जो भी चमका इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
तुम्हारे आगे तमाम-ए-आलम ना क्यों करे ज़ानू-ए-अदब ख़म
के पेशवयान-ए-दीं ने माना इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
ना क्यों करें नाज़ अहले-सुन्नत के तुम से चमका नसीब-ए-उम्मत
सिराज-ए-उम्मत मिला जो तुम सा इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
ख़ुदा ने तुझ को वो दी है रिफ़अत के तेरा मंसूब भी है मरफ़ूअ
तेरी इज़ाफ़त में रफ़अ पाया इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
हुआ उलुल-अम्र से ये साबित के तेरी ताअत ज़रूरी वाजिब
ख़ुदा ने तुम को किया हमारा इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा
किसी की आँखों का तू है तारा किसी के दिल का बना सहारा
मगर किसी के जिगर में आरा इमाम-ए-आज़म अबू हनीफ़ा