बाग़-ए-जन्नत में निराली चमन-आराई है
क्या मदीना पे फ़िदा हो कि बहार आई है
उन के गेसू नहीं रहमत की घटा छाई है
उन के अबरू नहीं दो क़िब्लों की यकजाई है
संगरेज़ों ने हयात-ए-अबादी पाई है
नाख़ूनों में तेरे एजाज़-ए-मसीहाई है
सर-ए-बअलीं उन्हें रहमत की अदा लाई है
हाल बिगड़ा है तो बीमार की बन आई है
जान-ए-गुफ़्तार तो रफ़्तार हुई रूह-ए-रवां
दम-ए-क़दम से तेरे एजाज़-ए-मसीहाई है
जिस के हाथों के बनाए हुए हैं हुस्न-ओ-जमाल
ऐ हसीं तेरी अदा उस को पसंद आई है
तेरे जलवों में ये आलम है कि चश्म-ए-आलम
ताब-ए-दीदार नहीं फिर भी तमाशाई है
जब तरी याद में दुनिया से गया है कोई
जान लेने को दुल्हन बन के क़ज़ा आई है
सर से पा तक तरी सूरत पे तसद्दुक़ है जमाल
इस को मौज़ूनी-ए-अज़ा ये पसंद आई है
तेरे क़दमों का तबर्रुक यद-ए-बैज़ा-ए-कलीम
तेरे हाथों का दिया फ़ज़्ल-ए-मसीहाई है
दर्द-ए-दिल किस को सुनाऊं मैं तुम्हारे होते
बेकसों की इसी सरकार में सुनवाई है
आप आए तो मुनव्वर हुईं अंधी आंखें
आप की ख़ाक-ए-क़दम सुरमा-ए-बीनाई है
ना-तवानी का अलम हम ज़ुअफ़ा को क्या हो
हाथ पकड़े हुए मौला की तवानाई है
जान दी तू ने मसीहा-ओ-मसीहाई को
तू ही तो जान-ए-मसीहा-ओ-मसीहाई है
वतन और इस का तड़का सदक़े इस शाम-ए-ग़रीबी पर
कि नूर-ए-रुकन-ए-शामी रौश-ए-सुब्ह-ए-मुनव्वर है
हुए ईमान ताज़ा बोसा-ए-रुकन-ए-यमानी से
फ़िदा हो जाऊं युमन-ओ-ऐमनी का पाक मंज़र है
यह ज़मज़म इस लिए है जिस लिए इस को पिए कोई
उसी ज़मज़म में जन्नत है उसी ज़मज़म में कौसर है
शफ़ा क्यों कर न पाएं नीम जां ज़हर-ए-मा'असी के
कि नज़ारा-ए-इराक़ी रुकन का तिरयाक़-ए-अकबर है
सफ़ा-ए-क़ल्ब के जलवे अयां हैं सई-ए-मस्आ से
यहां की बे-क़रारी भी सुकून-ए-जां मुज़्तर है
हुआ है पीर का हज्ज पीर ने जिन से शर्फ़ पाया
इन्हीं के फ़ज़्ल से दिन जुम्मा का हर दिन से बेहतर है
नहीं कुछ जुम्मा पर मौक़ूफ़ अफ़्ज़ाल-ओ-करम उन के
जो वह मक़बूल फ़रमा लें तो हर हज्ज हज्ज-ए-अकबर है
हसन हज्ज कर लिया का'अबा से आंखों ने ज़िया पाई
चलो देखें वह बस्ती जिस का रस्ता दिल के अंदर है