बनाया तुम्हें हक़ ने मुख्तार-ओ-हाकिम
वो क्या है नहीं जिस पे क़ब्ज़ा तुम्हारा
किया हक़ ने बहर-ए-कमालात तुम को
न पाया किसी ने किनारा तुम्हारा
मुयस्सर किसी को नहीं ऐसी रिफ़अत
कि जैसा हुआ पाया-ए-बाला तुम्हारा
रफ़अना का जलवा दिखाने को हक़ ने
लिखा अर्श पर नाम वाला तुम्हारा
क़बाइल के हिस्से किए जब ख़ुदा ने
किया सब से आला क़बीला तुम्हारा
अज़ानों में ख़ुतबों में शादी-ओ-ग़म में
ग़रज़ ज़िक्र होता है हर जा तुम्हारा
यह फ़र्श-ए-ज़मीं है तुम्हारी ही ख़ातिर
बना है समां शामियाना तुम्हारा
मुनव्वर हुआ आसमान-ए-रिसालत
उजाला है ऐसा दिल-आरा तुम्हारा