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बंद-ए-बदकार हूँ बे हद ज़लील-ओ-ख़ार हूँ

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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बंद-ए-बदकार हूँ बे हद ज़लील-ओ-ख़ार हूँ मग़फ़िरत फ़र्मा इलाही! तू बड़ा ग़फ़्फ़ार है मौत के झटकों पे झटके आ रहे हैं अल-मदद सख़्त बे-चैनी के आलम में घिरा बीमार है अब सरे-बालीं ख़ुदारा मुस्कुराते आइए जाँ-लब शाह-ए-मदीना तालिब-ए-दीदार है ग़ुस्ल देने के लिए ग़स्साल भी अब आ चुका ग़ुस्ल-ए-मय्यत हो रहा है और कफ़न तैयार है या नबी! पानी से सारा जिस्म मेरा धुल गया नाम-ए-आमाल को भी ग़ुस्ल अब दरकार है लाद कर कंधों पे अहबाब आह! क़ब्रिस्तान चले वास्ते तदफ़ीन के गहरा गढ़ा तैयार है क़ब्र में मुझ को लेटा कर मिट्टी डाल कर चल दिए साथी न पास अब कोई रिश्तेदार है