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बशर से ग़ैर मुमकिन है सना हज़रत-ए-मुहम्मद की

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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बशर से ग़ैर मुमकिन है सना हज़रत-ए-मुहम्मद की ख़ुदा करता है खुद क़ुरआन में मिदहत मुहम्मद की पसंद-ए-हक़ हुई सल्ल-ए-अला सूरत मुहम्मद की न क्यों दोनों जहाँ को दिल से हो चाहत मुहम्मद की है मुज़दः मोमिनों को मन रनी क़द रल-हक़ ख़ुदा देखा जिसे हासिल हुई रुअ'यत मुहम्मद की बशर जिन-ओ-मलक हरगिज़ नहीं मुमकिन कि पहचानें ख़ुदा ही जानता है रिफ़अत-ओ-शौकत मुहम्मद की ख़ुदा से अपनी उम्मत के लिए पूछा जो मूसा ने तो फ़रमाया कि अफ़ज़ल सब से है उम्मत मुहम्मद की हुए बुत सर-निगूं आतिश कदः में ज़लज़लः आया दिलों पर छा गई कुफ़्फ़ार के हैबत मुहम्मद की