बयाँ क्यों कर सनाए-मुस्तफ़ा हो
ख़ुदा जब उन का ख़ुद मِدहत सरा हो
मदीने की मुहब्बत में जो रोए
अता वो आँख वो मिट्ठे मुस्तफ़ा हो
सलामे-शौक़ कह देना अदब से
गुज़र हुए मदीना जब सबा हो
तड़प कर या रसूलल्लाह पुकारो
नहीं मुमकिन न आक़ा ने सुना हो
अता कर दो मुझे वो भीक दाता
मरे सारे क़बीले का भला हो
करूँ बे-लौस खिदमत सुन्नतों की
शहा गहर लुत्फ़ मुझ पर आप का हो
दे जज़्बा मदनी इनामात का तो
करम या सय्यदे-हर दो सरा हो
मैं मदनी क़ाफ़िलों ही का मुसाफ़िर
रहूँ अक्सर करम ऐसा शहा हो
करम हो दावते-इस्लामी पर ये
शरीक इस में हर इक छोटा बड़ा हो
मैं सब दौलत ये हक़ में लुटा दूँ
शहा ऐसा मुझे जज़्बा अता हो
गुनाहों ने कहीं का भी न छोड़ा
करम मुझ पर हबीबे-किब्रिया हो
गुनाहों की छुटे हर एक आदत
सुधर जाऊँ करम या मुस्तफ़ा हो
कई है ग़फ़्लतों में ज़िंदगानी
न जाने हश्र में क्या फ़ैसला हो
करम हो वास्ता गुले-औलिया का
मरा ईमाँ पे मौला ख़ात्मा हो
मरे आमाल तो ले जा रहे हैं
शफ़ाअत शाफ़िअ-रोज़े-जज़ा हो
इलाही हूँ बहुत कमज़ोर बंदा
न दुनिया में न उक़्बा में सज़ा हो
बरोज़े-हश्र आक़ा काश! कह दें
तुम ऐ अत्तार दोज़ख़ से रहा हो