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बयाँ क्यों कर सनाए-मुस्तफ़ा हो

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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बयाँ क्यों कर सनाए-मुस्तफ़ा हो ख़ुदा जब उन का ख़ुद मِدहत सरा हो मदीने की मुहब्बत में जो रोए अता वो आँख वो मिट्ठे मुस्तफ़ा हो सलामे-शौक़ कह देना अदब से गुज़र हुए मदीना जब सबा हो तड़प कर या रसूलल्लाह पुकारो नहीं मुमकिन न आक़ा ने सुना हो अता कर दो मुझे वो भीक दाता मरे सारे क़बीले का भला हो करूँ बे-लौस खिदमत सुन्नतों की शहा गहर लुत्फ़ मुझ पर आप का हो दे जज़्बा मदनी इनामात का तो करम या सय्यदे-हर दो सरा हो मैं मदनी क़ाफ़िलों ही का मुसाफ़िर रहूँ अक्सर करम ऐसा शहा हो करम हो दावते-इस्लामी पर ये शरीक इस में हर इक छोटा बड़ा हो मैं सब दौलत ये हक़ में लुटा दूँ शहा ऐसा मुझे जज़्बा अता हो गुनाहों ने कहीं का भी न छोड़ा करम मुझ पर हबीबे-किब्रिया हो गुनाहों की छुटे हर एक आदत सुधर जाऊँ करम या मुस्तफ़ा हो कई है ग़फ़्लतों में ज़िंदगानी न जाने हश्र में क्या फ़ैसला हो करम हो वास्ता गुले-औलिया का मरा ईमाँ पे मौला ख़ात्मा हो मरे आमाल तो ले जा रहे हैं शफ़ाअत शाफ़िअ-रोज़े-जज़ा हो इलाही हूँ बहुत कमज़ोर बंदा न दुनिया में न उक़्बा में सज़ा हो बरोज़े-हश्र आक़ा काश! कह दें तुम ऐ अत्तार दोज़ख़ से रहा हो