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बयां तुम से करूँ किस वास्ते मैं अपनी हालत का

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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बयां तुम से करूँ किस वास्ते मैं अपनी हालत का कि जब तुम पर अयां है हर दम सारी ख़िल्क़त का खुदाई भर के मालिक हो खुदाई तुम से बाहर है न कोई है न होगा हश्र तक तुम सी हुकूमत का न क्यों शाह ओ गदा फैलाएं झोली आस्ताने पर कि रखा हक़ ने तेरे सर पे ताज अपनी नियाबत का तू वो है ज़िल-ए-हक़ नूर-ए-मुजस्सम परतो-ए-कुदरत पसंद आया तेरे सानी को नक़्शा तेरी सूरत का मेरे वाली तेरे सदक़े में हम से नाबकारों ने लकब क़ुरान में पाया है खुदा से ख़ैर-ए-उम्मत का उन्हें क्या ख़ौफ़ हो उक़बा का और क्या फ़िक्र-ए-दुनिया की जमाए बैठे हैं जो दिल पे नक़्शा तेरी सूरत का