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बज़्म-ए-महशर मुनअक़िद कर मीर-ए-सामान-ए-जमाल

Written by Allama Hasan Raza Khan

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बज़्म-ए-महशर मुनअक़िद कर मीर-ए-सामान-ए-जमाल दिल के आइनो को मुद्दत से है अरमान-ए-जमाल अपना सदक़ा बांटता आता है सुल्तान-ए-जमाल झोलियां फैलाए दौड़ें बे-नवायान-ए-जमाल जिस तरह से आशिक़ों का दिल है क़ुर्बान-ए-जमाल है यूं ही क़ुर्बान तेरी शक्ल पर जान-ए-जमाल बे-हिजाबाना दिखा दो एक नज़र आन-ए-जमाल सदक़े होने के लिए हाज़िर हैं ख़्वाहान-ए-जमाल तेरे ही क़ामत ने चमकाया मुक़द्दर हुस्न का बस इसी इक्के से रौशन है शबिस्तान-ए-जमाल रूह लेगी हश्र तक ख़ुशबू-ए-जन्नत के मज़े गर बसा देगा कफ़न इत्र-ए-गरेबान-ए-जमाल मर गए उश्शाक़ लेकिन है चश्म-ए-मुंतज़िर हश्र तक आंखें तुझे ढूंढेंगी ए जान-ए-जमाल पेशगी ही नक़द-ए-जां देते चले हैं मुश्तरी हश्र में खोलेगा या रब कौन दुकान-ए-जमाल आशिक़ों का ज़िक्र क्या माशूक़ आशिक़ हो गए अंजुमन की अंजुमन सदक़े है ए जान-ए-जमाल तेरी ज़ुर्रियत का हर ज़र्रा न क्यों हो आफ़ताब सर-ए-ज़मीन-ए-हुस्न से निकली है यह कान-ए-जमाल बज़्म-ए-महशर में हसीं सब झुक रहे हैं पर नज़र तेरी उठती है ए जान-ए-जमाल आरही है ज़ुल्मत-ए-शब हाये ग़म पीछा किए नूर-ए-यज़दां हम को ले ले ज़ैर-ए-दामन-ए-जमाल वुसअत-ए-बाज़ार-ए-महशर है उस के हुज़ूर किस जगह खोले किसी का हुस्न दुकान-ए-जमाल ख़ूब रूयां जहां को भी यही कहते सुना तुम हो शान-ए-हुस्न-ए-जान-ए-हुस्न-ए-ईमान-ए-जमाल