शुक्र-ए-ख़ुदा कि आज घड़ी उस सफ़र की है
जिस पर निसार जान-ए-फ़लाह-ओ-ज़फ़र की है
गर्मी है तप है दर्द है कुल्फ़त सफ़र की है
नाशुक्र ये तो देख अज़ीमत किधर की है
किस ख़ाक-ए-पाक की तो बनी ख़ाक-ए-पा शफ़ा
तुझ को क़सम जनाब-ए-मसीह-ए-सर की है
आब-ए-हयात रूह है ज़रक़ा की बूँद बूँद
अक्सीर-ए-आज़म मस-ए-दिल-ए-ख़ाक-ए-दर की है
हम को तो अपने साये में आराम ही लाये
हीले बहाने वालों को ये राह डर की है
लुट्टे हैं मारे जाते हैं यूँ ही सुना किये
हर बार दी वो अमन कि गैरत-ए-हज़र की है
वो देखो जगमगाती है शब और क़मर अभी
पहरों नहीं कि बस्त-ओ-चहारम सफ़र की है
माह-ए-मदीना अपनी तजल्ली अता करे!
ये ढलती चाँदनी तो पहर दो पहर की है
मन् ज़ार तुर्बती वजबत लहू शफ़ाअती
उन पर दुरूद जिन से नवीद इन बशर की है
उस के तुफ़ैल हज्ज भी ख़ुदा ने करा दिये
अस्ल मुराद हाज़िरी उस पाक दर की है