दिल को सुकूँ चमन में न है लाला ज़ार में
सोज़-ओ-गुदाज़ है फ़क़त उन के दियार में
या मुस्तफ़ा बुलाइए अपने दियार में
सरकार! आऊँ तय्यबा के फिर लाला ज़ार में
हर साल या इलाही मुझे हज नसीब हो
जब तक जियूँ मैं आलम-ए-नापायदार में
हर साल हाज़िरी हो मदीने की ख़ैर से
हर साल काश! आऊँ मैं तेरे दियार में
सोज़-ए-बिलाल दो मुझे सोज़-ए-बिलाल दो
दे सकते हो तुम्हारे तो है इख़्तियार में
या रब! ग़म-ए-हबीब में रोना नसीब हो
आँसू न रायगाँ हों ग़म-ए-रोज़गार में
अफ़सोस घटती जा रही है रोज़-ए-ज़िंदगी
पर मैं दबा हूँ इस्यान के बार में
तुझ को हुस्न-ए-हुसैन का देता हूँ वास्ता
अल्लाह! मौत दे मुझे उन के दियार में