दो आलम गूँजते हैं नारा-ए-अल्लाह-उ-अकबर से
अज़ानों की सदाएँ आ रही हैं हफ़्त-ए-किश्वर से
करूँ याद-ए-नबी में ऐसे नाले दीदा-ए-तर से
कि ढल जाएँ गुनाह ला-तुअद मेरे रजिस्टर से
ख़ुदा ने नूर-ए-मौला से किया मख़्लूक़ को पैदा
सभी कौन-ओ-मकाँ मुश्तक़ हुए इस एक मस्दर से
वह सूरत जिस से हक़ का ख़ास जलवा आशकारा है
उसे तशबीह दे सकते हैं कब हम माह-ओ-अख़्तर से
कुछ ऐसा जोश पर है 'मन रानि क़द रल हक़'
ख़जल हैं मेहर-ओ-मह भी आप के रू-ए-मुनव्वर से
नहीं है और न हो सकता है बाद उन के नबी कोई
हुआ ज़ाहिर ये ख़त्म-उल-अम्बिया की मोहर-ए-अनवर से