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दो आलम गूँजते हैं नारा-ए-अल्लाह-उ-अकबर से

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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दो आलम गूँजते हैं नारा-ए-अल्लाह-उ-अकबर से अज़ानों की सदाएँ आ रही हैं हफ़्त-ए-किश्वर से करूँ याद-ए-नबी में ऐसे नाले दीदा-ए-तर से कि ढल जाएँ गुनाह ला-तुअद मेरे रजिस्टर से ख़ुदा ने नूर-ए-मौला से किया मख़्लूक़ को पैदा सभी कौन-ओ-मकाँ मुश्तक़ हुए इस एक मस्दर से वह सूरत जिस से हक़ का ख़ास जलवा आशकारा है उसे तशबीह दे सकते हैं कब हम माह-ओ-अख़्तर से कुछ ऐसा जोश पर है 'मन रानि क़द रल हक़' ख़जल हैं मेहर-ओ-मह भी आप के रू-ए-मुनव्वर से नहीं है और न हो सकता है बाद उन के नबी कोई हुआ ज़ाहिर ये ख़त्म-उल-अम्बिया की मोहर-ए-अनवर से